11. गांधी और उनका अनशन - Page 297

282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

रुपये प्रति मास कमा सकता है। बुनाई विभाग जैसे अधिक वेतन पाने वाले विभागों के द्वार उसके लिए सदैव बंद रहते हैं। अधिकारी वाला स्थान सवर्ण हिंदू के लिए आरक्षित रहता है। दलित वर्ग के कामगार को उसके मातहत गुलाम की भांति ही काम करना होगा, भले ही वह कितना भी वरिष्ठ अथवा दक्ष हो।

चर्खा या बेलन पर सूत लपेटने वाले विभागों में काम करने वाली दलित वर्गों की सैकड़ों महिलाएं मेरे पास आई हैं। उनकी शिकायत है कि नायकिनें सभी महिला श्रमिकों में कच्चे माल को बराबर-बराबर या समुचित अनुपात में नहीं बांटतीं। उसके स्थान पर वह समूचा कच्चा माल सवर्ण हिंदू महिलाओं को दे देती है और उनकी पूर्ण उपेक्षा करती हैं।

मेरा विचार है कि यह सही और उचित होगा कि अस्पृश्यता निवारण संघ इस सवाल को उठाए। इसके लिए वह इसकी निंदा के वास्ते जनमत तैयार करे। वह ऐसे केंद्र भी स्थापित करे, जो असमानता के तात्कालिक मामलों के संबंध में कार्यवाही करें।

अंततः मेरा विचार है कि संघ उस घृणा को मिटाने का प्रयास करे, जो स्पृश्य लोग अस्पृश्यों के करते हैं। उसी के कारण दोनों वर्ग एक-दूसरे से इतने अलग-थलग रहे हैं कि उसकी पृथक और अलग पहचान वाली इकाइयां बन गई हैं। मेरी राय में उसे मिटाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि दोनों के बीच निकटतर संपर्क स्थापित हो। केवल भागीदारी का कोई साझा चक्र ही उस अजनबीपन को दूरे करने में सहायक हो सकता है, जिसे लोग एक-दूसरे के संपर्क में आने पर अनुभव करते हैं। मेरी राय में इससे अधिक प्रभावी उपाय और नहीं हो सकता कि दलित वर्गों के लोगों को सवर्ण हिंदुओं के घरों में मेहमानों या सेवकों के रूप में प्रवेश मिले।

इस प्रकार स्थापित जीवंत संपर्क दोनों वर्गों को एक सांझे तथा सामूहिक जीवन का अभ्यस्त कर देगा। वह उस एकता के लिए मार्ग प्रशस्त कर देगा जिसके लिए हम सभी प्रयास कर रहे हैं। मुझे खेद है कि इसके प्रति रुचि प्रदर्शित करने वाले अनेक सवर्ण हिंदू इसके लिए तैयार नहीं हैं।

महात्मा के अनशन के उन दस दिनों के दौरान जिन्होंने भारतीय जगत को हिलाकर रख दिया था, विले पार्ले और महाड में ऐसी घटनाएं हुईं, जहां सवर्ण हिंदू नौकरों ने हड़ताल कर दी, क्योंकि उनके मालिकों ने अस्पृश्यों के साथ भाईचारा स्थापित करके अस्पृश्यता के नियमों को तोड़ दिया था। मुझे आशा थी कि मालिक हड़ताल को समाप्त करा देंगे और दुराग्रही लोगों के स्थान पर दलित वर्ग के लोगों को काम पर लगाकर उन्हें सबक सिखा देंगे। ऐसा करने के स्थान पर उन्होंने रुढि़वादी शक्तियों के आगे घुटने टेक दिए और उनके हाथ मजबूत