गांधी और उनका अनशन
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कर दिए। मुझे नहीं मालूम कि दलित वर्गें के ऐसे स्वार्थी मित्र उनके लिए कहा तक सहायक होंगे।
दुखी लोगों को इस बात से कोई सांत्वना नहीं मिल सकती कि उनके शुभचिंतक हैं, यदि वे शुभचिंतक कोरी सहानुभूति प्रकट करें। मैं संघ को यह भी बताना चाहूंगा कि इन सवर्ण हिंदू शुभचिंतकों की नेकनीयती के बारे में दलित वर्ग तब तक कभी भी संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक कि सिद्ध न हो जाए कि दलित वर्गों के हित की असली लड़ाई में अपने सगे-संबंधियों के खिलाफ वे उसी हद तक संघर्ष करेंगे, जिस हद तक कि उत्तरी अमरीका के श्वेतों ने अपने सगे-संबंधियों, यानी दक्षिण अमरीका के श्वेतों के खिलाफ नीग्रो लोगों की मुक्ति के लिए संघर्ष किया था।
इस कार्यक्रम को चलाने के लिए अस्पृश्यता निवारण संघ को कार्यकर्ताओं की एक अति विशाल सेना जुटानी पड़ेगी। हो सकता है कि सामाजिक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति को एक गौण प्रश्न समझा जाए। जहां तक मेरा संबंध है, मैं इस संबंध में किसी एजेंसी के चयन को बहुत अधिक महत्व देता हूं। उसके निमित्त किसी कार्य विशेष या अन्य कार्य के लिए वेतनभोगी कार्यकर्ता तो सदा ही मिल सकते हैं। मुझे विश्वास है कि भाड़े के ऐसे कार्यकर्ता संघ के प्रयोजन को सिद्ध नहीं कर सकेंगे। टॉल्स्टाय के शब्दों में, ‘जो प्रेम करते हैं, वही सेवा कर सकते हैं।’ मेरी राय में इस कसौटी पर दलित वर्गों के कार्यकर्ता अधिक खरे उतर सकेंगे। अतः मैं संघ से अपेक्षा करूंगा कि नियुक्ति करते समय वह प्रश्न के इस पहलू को ध्यान में रखेगा। मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि दलित वर्गों में ऐसे बदमाश नहीं हैं, जिन्होंने समाज सेवा को अपना अंतिम कवच नहीं बनाया है। लेकिन अधिकतर आप आशा कर सकते हैं कि दलित वर्गों का कार्यकर्ता यह कार्य निःस्वार्थ प्रेम से करेगा और वह संघ की सफलता के लिए अति अनिवार्य है।
दूसरे, ऐसी एजेंसियां हैं, जो पहले ही किसी-न-किसी प्रकार की समाज-सेवा में लगी हुई हैं और किसी वर्ग या प्रयोजन से बंधी हुई नहीं हैं। हो सकता है कि सहायता-अनुदान के बदले में वे अस्पृश्यता निवारण संघ के कार्य में आंशिक योगदान के लिए तैयार हो जाएं। मेरा दृढ़ विश्वास है, यदि मुझे कहने की अनुमति दी जाए, कि पारिश्रमिक द्वारा खरीद की यह कार्यशैली कोई स्थाई लाभ नहीं पहुंचा सकती। ऐसी एजेंसी की जरूरत है, जिसकी केवल एक ध्येय के प्रति पूर्ण निष्ठा हो। हमें ऐसी संस्थाओं और संगठनों की जरूरत है, जिन्होंने जान-बूझकर संकीर्णता को अपनाया है, ताकि वे अपने ध्येय के प्रति उत्साहपूर्ण हो सकें। कार्य को यदि सौंपना ही है तो ऐसे लोगों को सौंपा जाए, जो दलित वर्गों के कार्य के प्रति तन, मन, धन से पूर्णतया समर्पित हों।