284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अपनी बात को समाप्त करने से पहले मैं केवल यह कहना चाहूंगा। मेरे
विचार में, बेल्फोर ने कहा था ब्रिटिश साम्राज्य प्रेम के बल पर एकजुट हो सकता
है, कानून के बल पर नहीं। मेरा विचार है कि यह विचार हिंदू समाज पर भी
उतनी ही अच्छी तरह लागू होता है।
स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों के बीच एकता कानून के बल पर नहीं लाई जा सकती।
निश्चय ही वह पृथक निर्वाचक-मंडलों के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्रों को
रखकर किसी निर्वाचन-कानून द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। केवल प्रेम ही
उन्हें एकता के सूत्र में पिरो सकता है।
मेरी राय में परिवार से बाहर केवल न्याय ही प्रेम की संभावना को उपजा
सकता है। अस्पृश्यता निवारण संघ का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह देखे
कि स्पृश्य व्यक्ति अस्पृश्य के प्रति न्याय करे और यदि न करे तो उसे न्याय
करने पर मजबूर किया जाए। मेरी राय में अन्य कोई औचित्य संघ की परियोजना
अथवा अस्तित्व का हो ही नहीं सकता।
सचिव ने इस पत्र की पावती तक की सूचना नहीं दी। यह कहने की जरूरत नहीं कि मेरा एक भी सुझाव स्वीकार नहीं किया गया। यहां तक कि मेरा यह सुझाव भी स्वीकार नहीं किया गया कि संघ के कार्यकर्ता अधिकतर अस्पृश्यों में से ही लिए जाएं। वास्तव में जब श्री गांधी का ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाया गया कि हरिजन सेवक संघ भाड़े के हिंदुओं का अड्डा बन गया है तो उन्होंने उसका बचाव ऐसे आधारों पर किया, जिनसे यदि सच्चाई नहीं तो चतुराई तो अवश्य झलकती है। उन्होंने अस्पृश्यों के प्रतिनिधि-मंडल से कहा ख्1, ः
अस्पृश्यों का कल्याण-मार्ग एक ऐसा प्रायश्चित है, जिसे अस्पृश्यता के पाप
के लिए हिंदुओं को करना ही है। जो धन एकत्र किया गया है, उसे भी हिंदुओं
ने दिया है। दोनों ही दृष्टियों से केवल हिंदुओं को ही संघ को चलाना चाहिए। न
तो नैतिक और न ही अधिकार की दृष्टि से अस्पृश्यों के लिए यह उचित होगा
कि वे संघ के मंडल में सीट की मांग करें।
श्री गांधी तथा उनके सलाहकारों ने न केवल मेरे सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया, बल्कि संघ का संविधान बनाते समय ऐसे लक्ष्यों और उद्देश्यों को अपनाया जो इस बारे में मेरे सुझावों के सर्वथा विपरीत हैं। ख्2,
30 सितंबर, 1932 को बंबई में कोवासजी जहांगीर हाल में हुई सभा में संगठन के लक्ष्य इस प्रकार बताए गएः
- यह उद्धरण डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक, व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स, पृ. 142,
से लिया गया है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में इसका उल्लेख नहीं है µ संपादक। 2. वही, पृ. 140-41 से उद्धृत किया गया है, क्योंकि मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में पन्ना खाली छोड़ दिया
गया है µ संपादक।