11. गांधी और उनका अनशन - Page 300

गांधी और उनका अनशन

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अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रचार करना और तुरंत उपाय करना कि यथाशीघ्र सभी

सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं, सड़कों, स्कूलों, शव-दाहगृहों, श्मशान घाटों तथा

सभी सार्वजनिक मंदिरों को दलित वर्गों के लिए खोले जाने की घोषणा कर दी

जाए, परंतु कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की जाएगी और लक्ष्य-प्राप्ति के लिए केवल

शांति से अनुरोध ही किया जाएगा।

लेकिन इसके उद्घाटन के दो मास बाद 3 नवंबर को श्री जी.डी. बिड़ला और श्री ए.वी. ठक्कर ने जो बयान जारी किया, उसमें कहा गयाः

संघ का विचार है कि सनातनियों में समझदार लोग अस्पृश्यता-निवारण का

उतना विरोध नहीं करते, जितना की अंतर्जातीय सहभोजों और विवाहों का। चूंकि

संघ की यह महत्वकांक्ष नहीं है कि वह अपने क्षेत्र से परे के सुधारों को अपने

हाथ में ले, अतः यह स्पष्ट कर देना वांछनीय है कि जहां संघ सवर्ण हिंदुओं से

अनुरोध करके अस्पृश्यता का नामोनिशान मिटाने का प्रयास करेगा, उसके कार्य

की मुख्य धारा रचनात्मक होगी, जैसे शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर

दलित वर्गों का उत्थान। अस्पृश्यता-निवारण में इसके अति दूरगामी प्रभाव होंगे। ऐसे

कार्य के प्रति तो कट्टर सनातनी की भी सहानुभूति ही होगी। और मुख्यतः ऐसे

कार्य के लिए ही संघ की स्थापना की गई है। जातिप्रथा-उन्मूलन तथा सामूहिक

सहभोज जैसे समाज-सुधारों को संघ के क्षेत्र से परे रखा गया है।

इन लक्ष्यों तथा उद्देश्यों का वर्णन संघ की एक वार्षिक रिपोर्ट में किया गया है। उसमें कहा गया है ख्1, ः

इसके संविधान के अनुसार संस्था का लक्ष्य और उद्देश्य है, जन्म पर

आधारित अस्पृश्यता का उन्मूलन और अन्य हिंदुओं की भांति ही हरिजनों के

लिए सार्वजनिक मंदिरों, कुओं, स्कूलों तथा अन्य सार्वजनिक संस्थानों में प्रवेश

के समान अधिकारों का अर्जन।

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संस्था को दोहरा कार्य हाथ में लेना पड़ा है।

एक तो यह कि संस्था को सवर्ण हिंदुओं के विचारों तथा भावनाओं में ऐसा आमूल

परिवर्तन लाना है कि वे सहर्ष सहज रूप से हरिजनों को सभी नागरिक अधिकारों को

भोगने की अनुमति दे दें। दूसरा यह कि संस्था को अपनी शक्ति और अपनी निधियां

शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर हरिजनों के उत्थान में लगानी हैं।

जो कार्य किया गया है और जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, उन्हें साथ-साथ रखकर देखने से दो सवाल पैदा होते हैं। एक तो यह कि क्या ऐसे रिकार्ड पर संघ गर्व कर सकता है?

  1. रिपोर्ट (1932-33), पृ.1