सभ्यता या घोर असभ्यता
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साधन बन जाती है। सामाजिक विरासत हर पीढ़ी के लिए अति आवश्यक है। यदि यह सामाजिक विरासत नष्ट हो जाए तो सारी-की-सारी प्रगति ठप्प हो जाएगी। किसी ने ठीक कहा, यदि धरती से श्री वेल्स का कोई पुच्छलतारा टकरा जाए और यदि उसके फलस्वरूप इस समय का हर जीवित प्राणी वह सब ज्ञान और आदतें गंवा बैठे जो उसने पिछली पीढि़यों से प्राप्त की थीं, तो (भले ही खोज, स्मृति और अभ्यास की उसकी सभी शक्तियां ज्यों-की-त्यों बनी रहें) पृथ्वी की 9/10 जनसंख्या एक मास के भीतर और शेष 1/10 जनसंख्या की 99 प्रतिशत जनसंख्या छह मास के भीतर मर जाएगी। विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उनके पास कोई भाषा नहीं होगी, केवल अस्पष्ट ध्वनियां रह जाएंगी। वे न नोटिस पढ़ सकेंगे और न ही मोटरकार और घोड़े दौड़ा सकेंगे। जब उन्हें प्यास लगेगी तो सैंकड़ों की संख्या में वे कुछ स्वभावतः तगड़े व्यक्तियों की अस्पष्ट चीखों के पीछे-पीछे भागकर नदी के घाट पर पहुंच जाएंगे और डूब मरेंगे। मनुष्य समय रहते अपने जीवन को सुरक्षित रखने के बारे में कुछ नहीं कर सकेंगे, वे अन्न उठाने, पशुओं को पालने, आग जलाने और अपने लिए कपड़े बनाने के उपाय नहीं सोच सकेंगे। जीवन को पुनः शुरू से प्रारंभ करना होगा। जो पीढ़ी अपनी सामाजिक विरासत को गंवा देगी, उसे आदिम जाति की भांति अपना जीवन पुनः जंगली फलों तथा कीड़ों पर निर्भर करना होगा। यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक कि वह नई सामाजिक विरासत संचित न कर ले। कुछेक हजार पीढि़यों के बाद शायद वे कोई ऐसी चीज प्राप्त कर सकें, जिसे भाषा कहा जा सके, जिसे पशु-पालन और काश्तकारी की कोई कला कहा जा सके। हो सकता है कि वे धर्म या हमारे कुछ सरल यांत्रिक आविष्कारों या राजनीतिक युक्तियों जैसी कोई चीज पैदा कर लें या न भी कर लें। हो सकता है कि उनके पास कानून, आजादी, न्याय जैसे कोई सामान्य विचार हों या न हों। यह अंतर सामाजिक विरासत पैदा करती है और यह कोई मामूली अंतर नहीं।
यह सच है कि सभी का ऐसा सौभाग्य कहां कि वे सभ्य हो जाएं और जो ऐसे सौभाग्यशाली होते हैं भी, उन्हें भी सभ्यता धीरे-धीरे प्राप्त होती है और बीच-बीच में लंबे और उबाऊ विराम आते हैं। लेकिन यह भी सच है कि जो सभ्य हैं, उनकी सभ्यता मदद करने के स्थान पर रुकावट बन सकती है। हो सकता है कि वह गलत रास्ते पर चली जाए, हो सकता है कि वह नकली बुनियादों और नकली मूल्यों पर
खड़ी हो। ऐसी सभ्यता समाज को जड़ और व्यक्ति को ठूंठ बना सकती है। ऐसी सभ्यता की बेडि़यां डालने और ऐसी सभ्यता के बोझ तले पिसने से तो बेहतर होगा कि ऐसी सभ्यता के बिना ही रहा जाए।
हर देशभक्त हिंदू, डींग हांकता है कि हिंदू अथवा वैदिक सभ्यता दुनिया की