286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरा यह है कि क्या उसका कार्य संघ के लक्ष्यों के अनुरूप है? रिकार्ड बड़ा शोचनीय है। यह ऊंची दुकान और फीका पकवान जैसा है। संघ ईसाई मिशनों जैसा कार्य करने का दावा करता है, पर यदि उसकी तुलना उनके कार्य से की जाए तो वह ऐसा रिकार्ड है, जिस पर संघ गर्व नहीं कर सकता। लेकिन यह तो केवल खेद का विषय है। दूसरी सवाल बुनियादी किस्म का है। अतः उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यह अच्छी बात है कि संघ अस्पृश्यों के हित में श्रम करता है। लेकिन उसके श्रम की योजना ऐसी होनी ही चाहिए कि उससे अस्पृश्यता का उन्मूलन हो।
इस दृष्टि से विचार किया जाए तो संघ के कार्य के बारे में क्या कहा जाएगा? संघ खुलेआम निर्लज्ज भाव से अस्पृश्यों के लिए अलग स्कूलों, अलग छात्रावासों अलग डिस्पेंसरियों और अलग कुंओं का समर्थन कर रहा है। मुझे सोचना ही चाहिए कि यह तो अस्पृश्यता को अमर करने का सबसे पक्का उपाय है। कैसा आश्चर्य! जब श्री गांधी ने धमकी दी थी कि पृथक निर्चाचक-मंडलों के विरोध में वे आमरण अनशन करेंगे तो उनका तर्क था कि उससे अस्पृश्य अलग-थलग पड़ जाएंगे। अब वही ऐसी कार्यशैली को स्वीकृति दे रहे हैं, जो अलगाव को अमर बना देगी। अस्पृश्यों की सामाजिक सेवा करते समय श्री गांधी और उनका संघ यह भूल गए होंगे की अस्पृश्य क्या चाहते हैं। अस्पृश्य शिक्षा नहीं चाहते। वे तो चाहते हैं कि उन्हें सांझे स्कूलों में प्रवेश का अधिकार मिले। अस्पृश्य चिकित्सा सहायता नहीं चाहते। वे तो चाहते हैं कि उन्हें बराबरी की हैसियत से सामान्य डिस्पेंसरी में प्रवेश का अधिकार किले। अस्पृश्य पानी नहीं चाहता। वह तो चाहता है कि उसे सांझे कुएं से पानी भरने का अधिकार मिले। अस्पृश्य नहीं चाहता कि उसके कष्ट का निवारण हो। वह तो चाहता है कि उसके व्यक्तित्व का आदर किया जाए और उसके कलंक को मिटाया जाए। उसका कलंक मिटते ही उसका कष्ट समाप्त हो जाएगा। लगता है कि हरिजन सेवक संघ के पल्ले यह बात नहीं पड़ी। कहा जाता है कि संघ अस्पृश्यों का मित्र है और रूढि़वादी हिंदू अस्पृश्यों के शत्रु हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि मित्र ने ऐसा क्या किया है जो शत्रु नहीं करेगा। रूढि़वादी हिंदू का आग्रह है कि निश्चय ही अस्पृश्यों के लिए अलग स्कूल, डिस्पेंसरियां और अलग कुएं होंगे। संघ कहता है, ‘तेरी इच्छा पूर्ण हो’। अंतर केवल इतना है कि रूढि़वादी हिंदू अस्पृश्यता में विश्वास करता है और हरिजन सेवक संघ विश्वास नहीं करता। व्यवहार में मित्र और शत्रु के बीच क्या अंतर है? दोनों के अधीन अस्पृश्य को अलग स्कूलों, अलग छात्रावासों और अलग कुओं की यातना झेलनी पड़ती है। यदि ऐसा है तो समझ में नहीं आता कि किस कारण श्री गांधी और हरिजन सेवक संघ रूढि़वाद हिंदू से लड़े-झगड़े, यदि वह और उसका संघ मसले पर जोर नहीं देना चाहता। हिंदू शास्त्र अस्पृश्यता को