गांधी और उनका अनशन
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मान्यता देते हैं या नहीं, यह श्री गांधी और रूढि़वादी हिंदू के बीच कोरा पंडिताऊ शास्त्रार्थ है। उससे व्यवहार में कोई कल्याण नहीं हो सकता। इसके विपरीत मैं कह सकता हूं कि इससे अस्पृश्यों का ठोस अहित हुआ है। एक तो यह कि इसके कारण अस्पृश्यों तथा सवर्ण हिंदुओं के बीच शत्रुता पैदा हो गई है। श्री गांधी ने जब इस व्यर्थ के झगड़े को उठाया, उससे पूर्व अस्पृश्यों तथा हिन्दुओं के संबंध असामाजिक थे। झगड़े के कारण वे समाज-विरोधी हो गए। दूसरे, यदि यह झगड़ा न होता, यदि अस्पृश्यता को मुद्दा बनाने के स्थान पर जिसके विरुद्ध श्री गांधी संघर्ष नहीं करना चाहते, अस्पृश्यों के कष्ट के निवारण के लिए रूढि़वादी हिंदुओं से अपील की जाती है, तो मुझे मालूम है कि अनेक रूढि़वादी हिंदू कष्ट-निवारण में मदद के लिए आगे आते। श्री गांधी ने संघ की स्थापना का यश बटोर लिया है। लेकिन संघ ने न तो अस्पृश्यता को दूर करने का प्रयास किया है और न ही अस्पृश्यों के कष्ट-निवारण में मदद दी है।
संघ क्यों विफल रहा है? मेरा उत्तर एकदम निश्चित है। मेरा कहना है कि संघ अपनी गलत राजनीति के कारण विफल रहा है।
प्रायः यह कहा गया है कि हरिजन सेवक संघ राजनीतिक संगठन है। श्री गांधी ने इस आरोप पर सदैव खीज प्रकट की है और उसका खंडन भी किया है। संघ के महासचिव ने भी विरोध प्रकट किया है। उन्हीं के शब्दों में, ‘संघ भले ही राजनीतिक समझौते की उपज हो, पर उसके भीतर कोई राजनीति नहीं है।’
श्री गांधी की खोज और उनके सचिव के विरोध का मुझे तो कोई कारण नहीं दीख पड़ता। मेरी तो बड़ी इच्छा है कि संघ राजनीतिक संगठन होता। अस्पृश्यों को राजनीतिक सत्ता का एक अंश प्राप्त हुआ है। लेकिन सत्ता जिसे स्वयं अपना ज्ञान व भान न हो, कोई सत्ता नहीं होती। असंगठित सत्ता, सत्ता नहीं होती। हरिजन सेवक संघ बड़े काम का संगठन होता, यदि अस्पृश्य उसकी मदद से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र राजनीतिक दलों का गठन कर पाते और अपनी राजनीतिक सत्ता को पुरअसर बना पाते। मैं श्री गांधी और उनके सचिव के इस कथन को स्वीकार नहीं कर सकता कि सेवक संघ का राजनीत से कोई वास्ता नहीं है। इसके विपरीत मेरा आग्रह है कि सेवक संघ की एक निश्चित राजनीतिक धारा है। लेकिन राजनीति की वह गलत धारा है, क्योंकि वह अस्पृश्यों के हित के प्रतिकूल है।
चूंकि श्री गांधी यह स्वीकार नहीं करते कि सेवक संघ का राजनीति से कोई वास्ता है, अतः प्रमाण की परिस्थितियों को खोजना ही होगा। परिस्थिति से सिद्ध प्रमाण, मौखिक प्रमाण से सदा ही बेहतर होता है, क्योंकि वह विदित है कि मनुष्य झूठ बोल