288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सकता है, परिस्थितियां नहीं। इस संबंध में अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य के रूप में सेवक के संविधान के एक खंड को प्रस्तुत करना चाहता हूं। खंड का संबंध उन उपायों से है, जिन्हें सेवक संघ अस्पृश्यता-निवारण तथा अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के बराबर के अधिकार दिलाने के लिए अपनाएगा। खंड इस प्रकार हैः
अधिकार दिलाने के लिए कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जाएगी, अपितु केवल शांतिपूर्ण अनुरोध का उपाय ही अपनाया जाएगा।
सेवक संघ का यह एक मूल सिद्धांत है। मुझे यह विचित्र-सा लगा और मुझे विश्वास है कि अन्य सभी को भी यह विचित्र ही लगेगा। मैं प्रश्न करना चाहता हूं कि क्या कारण है कि सेवक संघ अस्पृश्यता-निवारण के एकमात्र उपाय के रूप में केवल सवर्ण हिंदुओं से ही अनुरोध करेगा?
अधिकांश समाज-सुधारकों का, चाहे वे धर्म में आस्था रखते हों या तर्क में, यह विचार दीख पड़ता है कि सत्तारूढ़ लोगों को जैसे ही यह बताया जाता है कि उनके कार्यकलाप और व्यवहार समाज विरोधी हैं, वे वैसे ही अपनी महत्वकांक्षाओं और अपने बल प्रयोग पर तुरंत अंकुश लगा देंगे। लेकिन जैसा कि प्रो. नेभुर ने कहा है ख्1, ः
ये सुधारक इस बात की अनदेखी करते हैं कि सभी मानव समूहों के व्यवहार
के मूल में बर्बरता, स्वार्थलोलुपता और सामूहिक अहंकार का भाव होता है और
वह समूहों के समूचे संबंधों पर हावी रहता है। वे इस तथ्य को भी भुला देते हैं
कि जातियों, राष्ट्रों तथा वर्गों में नैतिक निष्ठा उनकी रचना करने वाले व्यक्त्यिं
से कम होती है। अतः जातियों के बीच न्याय केवल शैक्षिक साधनों से प्राप्त
नहीं किया जा सकता। यदि उत्पन्न संघर्ष में धीरे-धीरे अंतरात्मा और तर्क का
सहारा लिया जाता है, तो वे केवल अन्याय में कमी कर सकते हैं, पर वे कभी
भी उसका उन्मूलन नहीं कर सकते। यदि अन्याय का उन्मूलन करना है, तो
उसका प्रतिरोध करना ही होगा। जब अन्याय सामूहिक शक्ति की ओर से होता
है, चाहे वह साम्राज्यवाद के रूप में हो या वर्ग प्रभुत्व के, तो उसको चुनौती
शक्ति द्वारा ही देनी होगी। शक्ति-संपन्न वर्ग के गढ़ को तभी गिराया जा सकता
है, जब उस पर शक्ति प्रहार किया जाए। बलवान द्वारा कमजोर के शोषण को
रोकने का एकमात्र यही उपाय है।
श्री गांधी और हरिजन सेवक संघ ने सवर्ण हिंदू, प्रभुत्व के प्रति बने विरोध को शांतिपूर्ण अनुरोध तक ही क्यों सीमित किया है? सवर्ण हिंदुओं के अन्याय का
- मौरल मैन एंड इम्मौरल सोसाइटी