11. गांधी और उनका अनशन - Page 305

290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का कारण है, उसकी गलत राजनीति। मेरा विश्वास है कि गलत राजनीति कहकर मैंने विनम्रता का परिचय दिया है। यह विश्वासघात है, यदि संरक्षक द्वारा अपने संरक्षित के हितों की बलि को विश्वासघात कहा जा सके।

श्री गांधी के भारतीय तथा विदेशी मित्र उनकी तुलना प्रायः यीशु मसीह से करते हैं। ऐसी विचित्र तुलना का क्या औचित्य हो सकता है? एक पहलू के बारे में दोनों के बीच मैं पूर्ण विरोधाभास देखता हूं। यीशु और श्री गांधी, दोनों का दावा है कि उन्होंने दीन-दुखियों की सेवा की। दोनों के इस मैत्रीपूर्ण रवैए का उच्च वर्गों ने विरोध किया। दोनों पर उस विरोध की क्या प्रतिक्रिया हुई? जब फरीसियों (पाखंडियों) ने यीशु पर ताने कसे तो उन्होंने करारा जवाब देते हुए कहा µ ‘वे जो भले-चंगे हैं उन्हें चिकित्सक की जरूरत नहीं होती, अपितु उन्हें होती है जो बीमार हैं।’ यीशु और श्री गांधी के रवैयों में कितना स्पष्ट विरोधाभास है। यीशु ने उनकी चिंता नहीं की जो ‘भले-चंगे’ थे। श्री गांधी उनके प्रति समर्पित हैं, जो ‘भले चंगे’ हैं और जो बीमारों और दलितों का अहित करके पाप कमा रहे हैं। श्री गांधी अस्पृश्यों के चिकित्सक नहीं हैं। अधिक-से-अधिक उन्हें शुभचिंतक कहा जा सकता है, उससे अधिक कुछ नहीं।

अस्पृश्यों के शुभचिंतक के रूप में भी श्री गांधी की सहानुभूति दो सावधानियों से जकड़ी हुई है। एक जकड़न तो उनके सामाजिक लक्ष्यों की है और दूसरी जकड़न उनकी राजनीति की है। कहीं इस कथन के बारे में संदेह न उठे, उसके लिए मैं दो उदाहरण देना चाहता हूं। उनमें से एक तो अभी हाल का है। श्री गांधी के निवास-स्थान मध्य प्रांत के शेगांव से निकट के स्थानों पर वे घटनाएं हुई हैं।

प्रथम उदाहरण जिसका मैं उल्लेख करूंगा, वह भारत में खरे-कांड के नाम से जाना जाता है। 1938 में मध्य प्रांत में मंत्रिमंडल संकट उत्पन्न हो गया। तब वहां कांग्रेस का मंत्रिमंडल था। मुख्यमंत्री डॉ. खरे की अपने सहयोगियों के साथ खटपट हो गई। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्होंने अन्य मंत्रियों से इस्तीफे की मांग की, पर वे कांग्रेस संसदीय बोर्ड की सहमति के बिना उसके लिए तैयार नहीं थे। लेकिन डॉ. खरे ने उन्हें इस्तीफे देने के लिए मजबूर किया। अंततः उन्होंने इस्तीफे दे दिए। उसके बाद डॉ. खरे ने दूसरा कांग्रेसी मंत्रिमंडल बना लिया और मंत्रिमंडल में अपनी इच्छा के लोगों को शामिल कर लिया। अपने नए मंत्रिमंडल में डॉ. खरे ने मंत्री के रूप में एक अस्पृश्य को शिमल कर लिया। डॉ. खरे का यह आचरण छानबीन के लिए कांग्रेस कार्यकारिणी के समक्ष लाया गया कि उन्होंने कांग्रेस संसदीय बोर्ड से परामर्श किए बिना पुराने मंत्रिमंडल को भंग करके नए मंत्रिमंडल का गठन कर लिया। डॉ. खरे को पार्टी का अनुशासन भंग करने का दोषी पाया गया और उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया गया। श्री गांधी ने डॉ. खरे पर एक आरोप यह भी लगाया कि उन्होंने