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गांधी और उनका अनशन

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अपने नए मंत्रिमंडल में एक अस्पृश्य को शामिल कर लिया। इस मुद्दे पर डॉ. खरे से श्री गांधी ने जो कुछ कहा, उसका समूचा मूलपाठ नीचे दिया गया है। इसे मेरे लिए डॉ. खरे ने लिपिबद्ध कियाः

महात्माजी ने मुझे डांटा व फटकारा कि मेंने क्यों अपने दूसरे मंत्रिमंडल में एक हरिजन को शामिल किया। मैंने करारा जवाब दिया कि हरिजनों का उत्थान तो कांग्रेस के कार्यक्रम का अंग है। उसके लिए तो महात्माजी ने आमरण अनशन किया। मैंने तो अवसर मिलते ही उस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए यथाशक्ति प्रयास किया। मेरा विचार है कि ऐसा करके मैंने कोई गलत काम नहीं किया है। उस पर महात्माजी ने मुझ पर आरोप लगाया कि मैंने यह कार्य अपनी स्वार्थपूर्ण महत्वकांशा की पूर्ति के लिए किया। मैंने इस आरोप का खंडन करते हुए कहा कि मेरा त्यागपत्र किसी भी स्वार्थपूर्ण प्रयोजन को झूठा सिद्ध कर देता है। तब महात्माजी ने कहा कि अपने कार्य से मैंने उस भोलेभाले समुदाय के लोगों के मानस में फूट की बीज बो दिया है और उन्होंने यह प्रलोभन देकर कांग्रेस के ध्येय को क्षति पहुंचाई है। ख्1,

यह सच है कि श्री गांधी ने मंत्रिमंडल में एक हरिजन को शामिल किए जाने पर आपत्ति की और उसका प्रमाण यह तथ्य है कि जब मध्य प्रांत में नए कांग्रेसी मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो केवल एक दिन के लिए मंत्री के रूप में कार्य करने वाले इस अस्पृश्य को शामिल नहीं किया गया। प्रथा के रूप में, कम-से-कम साख जमाने के लिए तो उसे शामिल किया जाना चाहिए था। उसे शामिल नहीं किया गया। उससे पता चलता है कि श्री गांधी ने सिद्धांत रूप में विरोध किया।

यह तो घोर अनर्थ है, क्योंकि मध्य प्रांत-विधानमंडल के जिस अस्पृश्य सदस्य को डॉ. खरे ने मंत्री-पद के लिए चुना था, वह ग्रेजुएट है, कांग्रेसी है और पार्टी के प्रति अति निष्ठावान है। ऐसे व्यक्ति को कांग्रेस के मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर श्री गांधी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? वास्तविकता तो यह है कि अस्पृश्यों के प्रति अपने व्यवहार में यदि श्री गांधी सच्चे होते तो वह कांग्रेस के सभी मुख्यमंत्रियों को अनुदेश देते कि वे अपने-अपने मंत्रिमंडलों में कम-से-कम एक अस्पृश्य को शामिल करें। भले ही इसका यदि कुछ और प्रभाव न भी होता तो कम-से-कम अस्पृश्यों तथा हिंदुओं पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो अवश्य होता। उन्हें यह कार्य दलगत भावना से ऊपर उठकर करना चाहिए था। श्री गांधी इस बात का विरोध नहीं करते कि जिन प्रांतों में कांग्रेस का बहुमत नहीं है, वहां पद

  1. बंबई में भारत सेवक मंडल के सभागार में हुई एक सभा में डॉ. खरे ने इस कथन को अपने कार्य के

समर्थन में दोहराया था।