292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्राप्त करने के लिए वे गैर-कांग्रेसी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाए। ऐसी मिलीजुली सरकारों में उन्होंने कांग्रेस को अनुमति दी है कि वह अपने मंत्रिमंडलों में गैर-कांग्रेसियों को मंत्री रूप में शामिल कर लें। यदि श्री गांधी कांग्रेस को उसकी अनुमति देते हैं और फिर भी उसकी जाति व वर्ण बना रहता है तो क्या कारण है कि श्री गांधी ने कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को कांग्रेसी मंत्रिमंडलों में अस्पृश्यों को शामिल किए जाने का अनुदेश क्यों नहीं दिया, यदि वह चाहते हैं कि जब वह अस्पृश्यों के प्रति अपने प्रेम की बात करते हैं तो उन पर विश्वास किया जाए। लेकिन मध्य प्रांत के मामले का तो आधार ही भिन्न है। यहां जिस अस्पृश्य व्यक्ति को मंत्री बनाया गया, वह ग्रेजुएट भी था और कांग्रेसी भी। वहां क्या आपत्ति हो सकती थी? वहां न तो योग्यता की कमी थी और न ही दल के प्रति निष्ठा की। उसे शामिल किए जाने पर श्री गांधी ने क्यों आपत्ति की? अनगिनत अस्पृश्य स्पष्टीकरण के लिए श्री गांधी के पास शेगांव गए। इसका पूर्वानुमान लगाते हुए श्री गांधी मौन धारण करने लगे, ताकि स्पष्टीकरण की नौबत ही ना आए। तब अस्पृश्यों ने श्री गांधी के खिलाफ इस कारण सत्याग्रह छेड़ दिया कि उन्होंने मध्य प्रांत के कांग्रेसी मंत्रिमंडल में एक अस्पृश्य को शामिल नहीं किया गया। इस परेशानी से बचने के लिए श्री गांधी शेगांव छोड़कर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांतों के दौरों पर चले गए। उद्देश्य था कि वह पठानों को अहिंसा का पाठ पढाएं। मुझे विश्वास है कि इस बार श्री गांधी का मौन ईश्वर का ध्यान करने के लिए नहीं था। वह तो सहज बहाना था, ताकि जिरह की अग्नि-परीक्षा ने देनी पड़े और अस्पृश्यों के बारे में उनके अंतरतम में छिपे विचारों की कलई न खुल जाए। जो भी हो, श्री गांधी ने हमें इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। मेरे विचार में केवल एक जवाब हो सकता है और वह यह है कि यदि श्री गांधी अपना मुंह खोलते, तब भी वह कोई बेहतर उत्तर नहीं दे सकते थे। वह जवाब यह है कि अस्पृश्यों के प्रति श्री गांधी का आदर्श बड़ा घटिया आदर्श है। वह तो बस इतना चाहते हैं कि अस्पृश्य को स्पर्श कर लिया जाए और यदि उसे स्पर्श करने के बाद किसी को स्नान न करना पड़े तो उसके अलावा उनके संबंध में और कुछ करने की जरूरत नहीं। यदि श्री गांधी प्रयास करते और फिर विफल हो जाते तो उन्हें माफ किया जा सकता था। लेकिन ऐसा घटिया लक्ष्य अपनाने के लिए उन्हें कैसे माफ कर दिया जाए? विफलता नहीं, बल्कि घटिया लक्ष्य अपनाना जुर्म है।
दूसरा उदाहरण जिसका उल्लेख मैं करूंगा, उसे बचूमा-कांड के नाम से जाना जाता है। यदि पहला उदाहरण घोर अनर्थ है तो दूसरा अति जघन्य। वह कितना जघन्य है, उसका पता मेरे द्वारा उल्लिखित तथ्य से चल जाएगा। बचूमा 12 वर्ष की