गांधी और उनका अनशन
293
बालिका थी। वह अस्पृश्य परिवार की थी। परिवार वर्धा में रहता था। (यह नाम जोड़ा गया है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में इसका उल्लेख नहीं है µ संपादक) । एक शाम को उसे बहला-फुसला कर एक मुसलमान पुलिस सब-इंस्पेक्टर के घर में ले जाया गया। उसे घर में रखा गया। रात्रि में इस नन्हीं बालिका के साथ तीन मुसलमानों ने बलात्कार किया। उनमें से एक तो स्वयं पुलिस अधीक्षक था दूसरा शिक्षा विभाग का सब-इंस्पेक्टर और तीसरा वकील था। तीनों मुसलमानों पर न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उनमें से दो को दो-दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई और वकील को बरी कर दिया गया, क्योंकि बालिका उसकी पहचान नहीं कर सकी। सजा पाने वाले दोनों मुसलमानों ने उच्च न्यायालय में अपील की, लेकिन उच्च न्यायालय ने उनकी अपीलें खारिज कर दीं और उनके दोष और सजा की पुष्टि कर दी। जेल उन्होंने गवर्नर-इन-काउंसिल के पास दया की याचिकाएं भेजीं। लेकिन वे भी अस्वीकार कर दी गईं। यह सब कांग्रेस के सत्ता में आने से पूर्व हुआ। जब कांग्रेस ने सत्ता संभाली तो उन्होंने प्रभारी मंत्री के पास दया के लिए नई अर्जियां भेजीं। प्रभारी मंत्री मुसलमान था। उसने सोचा कि यह कोई गलत काम नहीं है, यदि किसी मुसलमान ने अस्पृश्य बालिका के साथ बलात्कार किया। उसने अपराधियों को रिहा कर देने का फैसला किया। उसने एक अर्जी को मंजूरी दे दी। वह शिक्षा विभाग का इंस्पेकटर था। अब वह आजाद है और मुस्लिम राज्य के शिक्षा विभाग में एक ऊंचे पद पर तैनात है। मंत्री दूसरे अपराधी को भी रिहा करने ही वाला था, लेकिन उस बीच उसके विरुद्ध आंदोलन ने इतना जोर पकड़ लिया कि उसे अपने पद से ही इस्तीफा देना पड़ा। मंत्री की शर्मनाक करतूत के खिलाफ सभी ने रोष व्यक्त किया, पर श्री गांधी गूंगे बने रहे। इस मंत्री के खिलाफ निंदा का एक भी शब्द अभी तक उन्होंने नहीं कहा है। उल्टे, अब भी वह उस जोड़तोड़ में लगे हुए हैं, जो बर्खास्त मंत्री को उसके पद पर फिर से बहाल करने के लिए चल रही है। पद अब भी खाली रखा गया है। हम पूछना चाहेंगे कि क्या श्री गांधी तब भी इतने ही उदासीन और गूंगे बने रहते, यदि नन्हीं बालिका बचूमा जिसके साथ तीन मुसलमानों ने बलात्कार किया था, किसी अस्पृश्य की पुत्री होने के बजाए उनकी अपनी पुत्री होती। बचूमा के मामले को श्री गांधी अपनी पुत्री का मामला क्यों नहीं बना सके? इसके दो उत्तर हैं। एक यह है कि श्री गांधी अस्पृश्य नहीं हैं। इस पर तो विवश्ता ही प्रकट की जा सकती है। दूसरे, श्री गांधी का विचार है कि बचूमा के लिए मुस्लिम मंत्री की निंदा करने से वह उस हिंदू-मुस्लिम एकता को गंवा सकते हैं, जो कांग्रेस की राजनीति का मूल सिद्धांत है। क्या इससे पता नहीं चलता कि अस्पृश्यों के प्रति श्री गांधी की सहानुभूति पर उनकी राजनीति की पाबंदी लगी हुई है?