294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वह व्यक्ति किस काम का है, जो स्वतंत्रता से अपनी अंतरात्मा के अनुसार सहानभूति भी प्रकट नहीं कर सकता।
III
और अब बारी है मंदिर-प्रवेश की। इसके बारे में भी ढोल पीटा जाता है कि वह अस्पृश्यों के लिए श्री गांधी की एक और देन है।
मंदिर-प्रवेश का यह मसला उस संकल्प की उपज है, जिसे 25 सितंबर, 1932 को हिंदुओं की एक सार्वजनिक सभा में पारित किया गया। इसी आदि कारण ने ही हरिजन सेवक संघ को जन्म दिया। इस संकल्प में अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओ के कतिपय दायित्वों का उल्लेख है। इस सूची में यह भी शामिल है कि हिंदू मंदिरों में अस्पृश्यों के प्रवेश पर लगी रोक को हटाया जाए।
हालांकि संकल्प में मंदिर-प्रवेश का वचन दिया गया था, पर अस्पृश्यों ने उसे तुरंत पूरा किए जाने का आग्रह नहीं किया। बहरहाल, अस्पृश्यो की एक विशाल संख्या मंदिर-प्रवेश के लिए उत्सुक नहीं रही है। जब श्री गांधी ने मुझ से पूछा कि मंदिर-प्रवेश के बारे में मेरे क्या विचार है, तो मैंने उसके बारे में अपनी राय एक वक्तव्य के रूप में दी। यह वक्तव्य प्रेस के लिए 10 [*] फरवरी 1933 को जारी किया गया था। वह इस प्रकार हैः
मंदिर-प्रवेश पर वक्तव्य
यद्यपि मंदिर-प्रवेश के मसले के बारे में विवाद को केवल सनातनियों और
महात्मा गांधी तक ही सीमित किया जाता है, तथापि इसमें संदेह नहीं कि दलित
वर्गों को उसमें एक अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा करनी होगी। जब मसले पर
अंतिम समझौते के लिए विचार होगा तो निश्चय ही उनका रवैया तराजू के किसी
पलड़े को हल्का या भारी करेगा। अतः यह आवश्यक है कि उनके दृष्टिकोण
की व्याख्या करके उसे स्पष्ट कर दिया जाए, ताकि उसके बारे में कोई दुविधा
न रह जाए।
इस समय जिस रूप में श्री रंगा अय्यर के मंदिर-प्रवेश विधेयक का प्रारूप
तैयार किया गया है, उसे दलित वर्ग संभवतः अपना समर्थन नहीं दे सकते।
विधेयक का सिद्धांत है कि यदि जनमत-संग्रह कराए जाने पर किसी मंदिर विशेष
के आस-पास के नगरपालिका एवं स्थानीय बोर्ड के बहुसंख्य वोटर बहुमत से
निर्णय करें कि दलित वर्गों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी जाए तो मंदिर
- डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक, ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स’ के पृ. 108-113 में
कहा गया है कि यह वक्तव्य 14 फरवरी, 1933 का है µ संपादक।