गांधी और उनका अनशन
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के न्यासी अथवा प्रबंधक इस निर्णय को कार्यरूप देंगे ही। सिद्धांत बहुमत के शासन का सामान्य सिद्धांत है और विधयेक का कोई भी क्रांतिकारी अथवा आमूल परिवर्तनवादी पक्ष नहीं है। यदि सनातनियों में थोड़ी-सी भी बुद्धि होगी तो वे इसे बिना किसी पूर्वापत्ति के स्वीकार कर लेंगे।
दलित वर्ग इस सिद्धांत पर आधारित विधेयक का क्यों समर्थन नहीं कर सकते, इसके दो कारण हैं। एक कारण यह तो यह है कि विधेयक दलितों के लिए मंदिर-प्रवेश के दिन को और निकट नहीं ला सकता। समय उतना ही लगेगा, जितना विधेयक के बिना लगता। यह सच है कि विधेयक के अधीन अल्पसंख्यक वर्ग को उस न्यासी अथवा प्रबंधक के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त करने को अधिकार नहीं होगा, जो बहुमत के निर्णय के अनुसार मंदिर के द्वार दलित वर्गों के लिए खोल देगा। लेकिन इससे पूर्व कि हम इस खंड से कोई संतोष प्राप्त कर सकें और विधेयक के प्रारूपकार को बधाई दे सकें, हमें सबसे पहले इस बारे में आश्वस्त होना पड़ेगा कि जब मसले पर मतदान होगा तो बहुमत मंदिर-प्रवेश का पक्षधर होगा ही। यदि हम किसी भ्रमजाल में नहीं फंसे होंगे तो हमें स्वीकार करना ही होगा कि यदि इस बात की कोई आशा हो तो भी इसकी अति क्षीण संभावना है कि बहुमत मंदिर-प्रवेश का समर्थन करेगा ही। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज बहुमत निश्चय ही विरुद्ध है। यह एक ऐसा तथ्य है, जिसे शंकराचार्य के साथ अपने पत्राचार में विधेयक के प्रारूपकार ने स्वयं स्वीकार किया है। विधेयक के पास हो जाने के बाद उस स्थिति में क्या होगा जब हमें यह लगने लगे कि बहुमत तो विपरीत आचरण करेगा? मेरे विचार में तो कुछ नहीं हो सकेगा। निस्संदेह मुझे तो गुर्वायूर मंदिर संबंधी जनमत-संग्रह के परिणामों की याद सताने लगेगी। लेकिन में महात्मा गांधी के प्राणों से अभिभूत जनमत-संग्रह को सामान्य परिणाम स्वीकार नहीं करता। ऐसे किसी भी आकलन में जरूरी है कि महात्मा के प्राणों को आकलन में नहीं ही लेना होगा। दूसरे, विधेयक में अस्पृश्यता को पापपूर्ण प्रथा नहीं माना गया है। उसमें अस्पृश्यता को केवल ऐसी सामाजिक बुराई माना गया है, जिसके लिए जरूरी नहीं कि वह अन्य प्रकार की सामाजिक बुराइयों से बदतर हो। क्योंकि उसमें अस्पृश्यता को, जिस रूप में वह है, गैर-कानूनी घोषित नहीं किया गया है। उसकी अनिवार्यता तभी समाप्त होती है जब बहुमत वैसा करने का निर्णय करे। पाप और अनैतिकता को इसलिए सहन नहीं किया जा सकता कि बहुसंख्यक उसके आदी हो गए हैं अथवा बहुसंख्यक उसे व्यवहार में लाना चाहते हैं। यदि अस्पृश्यता कोई पापपूर्ण और अनैतिक प्रथा है तो दलित वर्गों की दृष्टि से उसका उन्मूलन बिना किसी संकोच के होना चाहिए, भले