11. गांधी और उनका अनशन - Page 311

296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ही बहुसंख्यक उसे स्वीकार करते हों। इसी रीति से सभी प्रथाओं का निपटारा न्यायालय करते हैं, यदि वे पाते हैं कि प्रथाएं अनैतिक हैं और लोक-नीति के विरुद्ध हैं। पर विधेयक में ठीक ऐसी व्यवस्था नहीं की गई है। विधेयक का प्रारूपकार अस्पृश्यता की प्रथा के बारे में उतनी ही गंभीर दृष्टि अपनाता है, जितनी की मद्यमान की लत छुड़ाने के बारे में सुधारक अपनाता है। वास्तविकता तो यह यह कि वह दोनों के बीच कल्पित समानता से इतने प्रभावित हैं कि उन्होंने जो तरीका अपनाया है, वह ऐसा तरीका है जिसकी वकालत मद्यत्याग सुधारक मद्यपान की लत के उन्मूलन के लिए करते हैं, और वह है प्रांत विशेष में मद्यनिषेध का अधिकार। दलित वर्गों के ऐसे किसी मित्र के हम अधिक आभारी नहीं हो सकते, जो अस्पृश्यता को मद्यपान से बदतर नहीं समझता। यदि रंगा अय्यर यह भूल नहीं गए होते कि केवल कुछ महीने पूर्व ही महात्मा गांधी ने आमरण अनशन के लिए कमर कस ली थी यदि अस्पृश्यता का निवारण न किया गया, तो वह इस अभिशाप के बारे में और अधिक गंभीर दृष्टि अपनाते और उसके समूल विनाश के लिए सर्वाधिक सम्यक सुधार का प्रस्ताव रखते। प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से उसकी जो भी त्रुटियां हों, दलित वर्ग कम-से-कम यह आशा तो कर सकते हैं कि विधेयक इस सिद्धांत को मान्यता दे कि अस्पृश्यता पाप है। मैं वास्तव में समझ नहीं पा रहा हूं कि महात्मा गांधी इस विधेयक से कैसे संतुष्ट हो गए। वह तो आग्रह करते रहे हैं कि अस्पृश्यता पाप है। निश्चय ही इससे दलित वर्ग संतुष्ट नहीं हुए हैं। यह प्रश्न एक गौण प्रश्न है कि विधेयक अच्छा है या बुरा, पर्याप्त है या अपर्याप्त। मुख्य प्रश्न है, दलित वर्ग मंदिरों में प्रवेश करना चाहते हैं या नहीं, इस मुख्य प्रश्न के प्रति दलित वर्गों के दो दृष्टिकोण हैं। एक तो आर्थिक दृष्टिकोण है। उस दृष्टि से दलित वर्गों का विचार है कि उनके उत्थान का सर्वाधिक ठोस तरीका यह है कि उन्हें उच्च शिक्षा और उच्च रोजगार मिले और रोजी-रोटी कमाने के बेहतर अवसर प्राप्त हों। एक बार यदि वे सामाजिक जीवन के ढांचे में सुस्थापित हो जाएंगे तो उनका सम्मान होने लगेगा। एक बार यदि उनका सम्मान होने लगेगा तो निश्चय ही उनके प्रति रूढि़वादियों के धार्मिक दृष्टिकोण में परिवर्तन होगा। यदि ऐसा नहीं भी होता, तो भी उससे उनके आर्थिक हित पर कोई आंच नहीं आ सकती। इन दृष्टिकोणों के आधार पर दलित वर्ग कहते हैं कि वे मंदिर-प्रवेश जैसे खोखले कार्य पर अपने संसाधन खर्च नहीं करेंगे। एक अन्य कारण से भी वह इसके लिए संघर्ष नहीं करना चाहते। यह दृष्टिकोण ‘आत्मसम्मान’ का दृष्टिकोण है। अभी ज्यादा अर्सा नहीं हुआ जब भारत में यूरोपीयों द्वारा संचालित क्लबों तथा सामाजिक सैरगाहों के बोर्डों पर