11. गांधी और उनका अनशन - Page 312

गांधी और उनका अनशन

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लिखा जाता थाः ‘कुत्तों और भारतीयों को प्रवेश की अनुमति नहीं है।’ आज हिंदुओं के मंदिरों के आगे ऐसे ही बोर्ड लगे हुए हैं। अंतर केवल इतना है कि हिंदू मंदिरों के बोर्ड ताल ठोक कर कहते हैं, ‘सभी हिंदुओं तथा कुत्तों-सहित सभी पशुओं को प्रवेश की अनुमति है, केवल अस्पृश्य प्रवेश नहीं कर सकते।’ दोनों दशाओं में स्थिति एक जैसी है। लेकिन हिंदुओं ने कभी भी उन स्थानों में प्रवेश की चिरौरी नहीं की थी, जिनके द्वारा यूरोपीयों ने अहंकारवश बंद कर दिए थे। तो क्यों कोई अस्पृश्य उस स्थान में प्रवेश के लिए चिरौरी करे, जिसके द्वारा हिंदुओं ने अहंकारवश बंद कर दिए हैं? अपने आर्थिक कल्याण में रुचि रखने वाले अस्पृश्य का यह तर्कसम्मत दृष्टिकोण है। वह हिंदुओं से यह कहने के लिए तैयार है, ‘आप अपने मंदिरों के द्वार खोले या न खोले, इस प्रश्न पर विचार करना आपका काम है, मैं उस पर उत्तेजना क्यों प्रकट करूं। यदि आप सोचते हैं कि मानव व्यक्तित्व की पवित्रता का अनादर अशिष्टता है तो अपने मंदिरों के द्वार खोल दें और सज्जनता का परिचय दें। यदि सज्जन के बजाए आप हिंदू रहना चाहते हैं तो आप अपने द्वार बंद रखें और भाड़ में जाएं आप, क्योंकि मंदिर में आने की मुझे कोई चिंता नहीं है।’

मैंने दृष्टिकाण को इस रूप में प्रस्तुत करना जरूरी समझा, क्योंकि मैं पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे व्यक्तियों के मन से यह धारणा निकाल देना चाहता हूं कि दलित वर्ग उनके संरक्षण के लिए आतुर हैं। दूसरा दृष्टिकोण आध्यात्मिक दृष्टिकोण है। धर्मपरायण लोगों की भांति दलित वर्ग मंदिर-प्रवेश की इच्छा रखते हैं या नहीं? प्रश्न यह है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से वे मंदिर-प्रवेश के प्रति वैसे उदास नहीं होंगे, जैसे कि वे होंगे यदि केवल आर्थिक दृष्टिकोण ही चलता रहेगा। लेकिन उनका अंतिम उत्तर उस उत्तर पर निर्भर करेगा, जो महात्मा गांधी और हिंदू निम्न प्रश्नों का देंगेः

मंदिर-प्रवेश के इस प्रस्ताव के पीछे क्या उद्देश्य है? हिंदू समाज में दलित वर्गों के सामाजिक स्तर के उत्थन का अंतिम लक्ष्य क्या मंदिर-प्रवेश होगा? अथवा क्या यह केवल पहला कदम है और यदि यह पहला कदम है तो अंतिम लक्ष्य क्या है? अंतिम लक्ष्य के रूप में मंदिर-प्रवेश का समर्थन दलित वर्ग कदापि नहीं कर सकते। वस्तुतः वे न केवल उसे ठुकरा देंंगे, बल्कि वे स्वयं को हिंदू समाज द्वारा तिरस्कृत समझेंगे और वे अपने भाग्य को कहीं अन्यत्र आजमाने के लिए आजाद होंगे। दूसरी ओर, यदि इस दिशा में यह केवल पहला कदम है तो हो सकता है कि वे इसका समर्थन करना चाहें। तब यह स्थिति वैसी ही होगी, जैसी कि आज भारत की राजनीति की है। सभी भारतीयों ने भारत के लिए