11. गांधी और उनका अनशन - Page 313

298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

औपनिवेशिक दर्जे की मांग की है। वास्तविक संविधान में औपनिवेशिक दर्जा नहीं होगा। फिर भी अनेक भारतीय उसे स्वीकार कर लेंगे। क्यों? उत्तर यह है कि चूंकि लक्ष्य की व्याख्या कर दी गई है तो इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता अगर लक्ष्य की ओर एक छलांग में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ा जाए। लेकिन यदि अंग्रेज औपनिवेशिक दर्जे के लक्ष्य को स्वीकार न करते तो कोई भी उन आंशिक सुधारों को स्वीकार न करता, जिन्हें अब अनेक स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उसी प्रकार यदि महात्मा गांधी और सुधारक यह घोषणा कर दें कि हिंदू समाज में दलित वर्गों के सामाजिक स्तर के उत्थान के लिए अपने सामने उन्होंने क्या लक्ष्य निर्धारित किया है, तो दलित वर्गों के लिए मंदिर-प्रवेश के बारे में अपने दृष्टिकोण की व्याख्या करना अधिक सरल हो जाएगा। यहां दलित वर्गों के लक्ष्य की घोषणा सभी संबद्ध पक्षों के विचारार्थ और सूचनार्थ की जा सकती है। दलित वर्ग एक ऐसा धर्म चाहते हैं, जो उन्हे समान सामाजिक दर्जा प्रदान करे। कोई गलतफहमी न हो, इसके लिए मैं मुद्दे को स्पष्ट करना चाहूंगा। इसके लिए मैं उन सामाजिक बुराइयों के बीच विभेद बताऊंगा, जो लौकिक कारणों से उपजती हैं और जो धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित होती हैं। सभ्य समाज में सामाजिक बुराइयों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। लेकिन इससे अधिक घिनौनी और ओछी बात नहीं हो सकती कि सर्वमान्य सामाजिक बुराइयों को धार्मिक आधार पर उचित ठहराया जाए। दलित वर्गों पर जो अन्याय हो रहे हैं, जो सकता है कि वे उनका प्रतिकार न कर सकें, लेकिन उन्होंने निश्चय कर लिया है कि वे ऐसे धर्म को सहन नहीं करेंगे, जो इन अन्यायों के बनाए रखने का समर्थन करेगा। यदि हिंदू धर्म को उनका धर्म होना ही है तो उसे सामाजिक समता का धर्म बनाना ही होगा। सभी के लिए केवल मंदिर-प्रवेश के प्रावधान द्व ारा हिंदू धर्म संहिता में संशोधन मात्र कर देने से उसे समान सामाजिक दर्जे वाला धर्म संहिता में संशोधन मात्र कर देने से उसे समान सामाजिक दर्जे वाला धर्म नहीं बनाया जा सकता। वह बस इतना ही कर सकता है कि उन्हें विदेशी के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय के रूप में मान्यता दे दे, यदि मुझे राजनीति में अति प्रचलित शब्दों के उपयोग की अनुमति दी जा सके। लेकिन उसका यह अर्थ नहीं हो सकता कि उसके द्वारा वे ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे, जहां ऊंच-नीच की भावना से मुक्त होकर वे आजाद और बराबर होंगे। उसका सहज कारण यह है कि हिंदू धर्म सामाजिक दर्जे की समता के सिद्धांत को मान्यता नहीं देता। उल्टे, वह असमानता के सिद्धांत का पोषण करता है, क्योंकि वह लोगों का श्रेणीकरण ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के रूप में करने का आग्रह करता है। वहां जो घृणा करता है, उसका दर्जा ऊंचा होता जाता है। और जिसका अपमान किया