गांधी और उनका अनशन
299
जाता है, उसका दर्जा नीचा होता जाता है, यदि हिंदू धर्म को सामाजिक समता वाला धर्म बनाना है तो उसकी संहिता में मंदिर-प्रवेश संबंधी संशोधन करना पर्याप्त नहीं होगा। होना यह चाहिए कि उसमें से चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत को निकाल दिया जाए। वही सभी प्रकार की असमानता का मूलाधार है। वही जातिप्रथा और अस्पृश्यता की जननी है। जातिप्रथा और अस्पृश्यता को असमानता के ही रूप है। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक दलित वर्ग न केवल मंदिर-प्रवेश को, बल्कि हिंदू धर्म को भी ठुकराएंगे। चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा दलित वर्गों के आत्मसम्मान के प्रतिकूल है। जब तक वह उसका मूल सिद्धांत बना रहेगा, तब तक निश्चय ही दलित वर्गों को हेय दृष्टि से देखा जाता रहेगा। यदिल दलित वर्ग कहते हैं कि वे हिंदू हैं तो वे अपने ही मुख से अपने दर्जे की हीनता को स्वीकार करते हैं। वे अपने आपको हिंदू तभी कह सकते हैं, जब चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी जाए और शास्त्रों से उसका बहिष्कार कर दिया जाए। क्या महात्मा तथा हिंदू सुधारक इसे अपना लक्ष्य स्वीकार करते हैं और क्या वे इसके लिए अपना पसीना बहाने का साहस दिखाएंगे? मैं इस मसले पर उनकी घोषणाओं की प्रतीक्षा करूंगा, क्योंकि मुझे इस बारे में भारी चिंता है। महात्मा गांधी और हिंदू इसके लिए तैयार हों या न हों, लेकिन वे सदा-सर्वदा के लिए यह जान लें कि इससे कम में दलित वर्ग संतुष्ट नहीं होंगे और मंदिरों में प्रवेश भी नहीं करेंगे। मंदिर-प्रवेश को स्वीकार करना और उससे संतुष्ट हो जाना बुराई से समझौता कर लेना है और अपने मानवीय व्यक्तित्व की गरिमा को बेच डालना है।
लेकिन मैंने जो दृष्टिकोण अपनाया, है उसके विरोध में महात्मा गांधी और सुधारवादी हिंदू एक दलील दे सकते हैं। वे कह सकते हैं, ‘यदि दलित वर्ग अब मंदिर-प्रवेश को स्वीकार कर लेंगे तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि वे इसके बाद चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए संघर्ष नहीं कर सकेंगे।’ यदि यह उनका लक्ष्य है तो मैं अभी और यहीं उनके तर्क के प्रति जवाबी निर्णायक तर्क देना चाहूंगा, ताकि भावी घटनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाए। मेरा उत्तर है कि यह सच है कि यदि मैं इस समय मंदिर-प्रवेश को स्वीकार कर लेता हूं तो चातुर्वर्ण्य और जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए संघर्ष का मेरा अधिकार छिन नहीं जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि जब प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाएगा, उस समय महात्मा गांधी किस ओर होंगे? यदि वे मेरे विरोधियों के खेमें में होंगे तो मैं उनसे यही कहूंगा कि मैं इस समय उनके खेमे में नहीं आ सकता। यदि वह
खेमें में होंगे तो उन्हें अभी और इसी समय मेरे खेमें में आना पड़ेगा।