300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मंदिर-प्रवेश के मसले के बारे में मेरे मित्र के बारे में दीवान बहादुर आर. श्रीनिवासन ने भी लगभग ऐसे ही विचार व्यक्ति किए हैं। उन्होंने कहा हैः
जब दलित वर्ग के किसी व्यक्ति को सवर्ण हिंदू के मंदिरों में प्रवेश की
अनुमति दी जाती है तो उससे उसे चारों में से किसी एक वर्ण में शामिल नहीं
कर लिया जाएगा, बल्कि उसे तो पांचवें या अंतिम या निकृष्टतम वर्ण का समझा
जाएगा। वह कलंक को अस्पृश्य कहलाने से भी बदतर है। साथ ही उसे अनेक
वर्ण-प्रतिबंधों और अवमाननाओं का शिकार बनाया जाएगा। इस प्रकार जो प्रवेश
करता है, उसका बहिष्कार दलित वर्ग के लोग उसे सवर्ण कहकर करते हैं।
दलित वर्गों के करोड़ों लोग वर्ण-प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं करेंगे। यदि वे करेंगे
तो खंड-खंड हो जाएंगे।
मंदिर-प्रवेश के कानून द्वारा जबरन नहीं लादा जा सकता। गांवों के सवर्ण
लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कानून की अवहेलना करते हैं। गांव के दलित
वर्ग के लोगों के लिए यह उस कागज के टुकड़े जैसा होगा, जिस पर लिखा हो
‘चीनी’ और उसे चखने के लिए उसके हाथ पर रख दिया जाए।
उक्त तथ्य समय रहते आम आदमी के सामने रख दिए गए हैं, ताकि देश
में अराजकता और अव्यवस्था न फैले।
लेकिन श्री गांधी का विचार कुछ और ही है। उनका विचार है कि अस्पृश्यों के पहले में प्रवेश का दायित्व हिंदुओं का है और उसे पूरा पूरा किया जाना चाहिए। तदनुसार पूना समझौते के तुरंत पश्चात् उन्होंने हिंदुओं के बीच यह अभियान छेड़ा कि वे अपने मंदिरों के द्वार अस्पृश्यों के लिए खोल दें।
इस मसले में श्री गांधी कहां तक सफल हुए हैं, यह एक ऐसा प्रश्न है, जो उनसे वैध रूप से पूछा जा सकता है। लेकिन सच्चाई को जानना कठिन है। कहा जाता है कि अनशन के फलस्वरूप हिंदुओं के अनेक मंदिरों के द्वार अस्पृश्यों के लिए खोल दें। पर यह कहना मुश्किल है कि इसमें कितनी सच्चाई है और कहां तक यह उस झूठे प्रचार-प्रसार का अंग है, जिसे करने में कांग्रेसी सिद्धहस्त हैं। यह निर्विवाद तथ्य है कि अनशन के कारण जिन अनेक मंदिरों के द्वार खोले गए, उनकी पुनः शुद्धि की गई और उनके कपार्ट अस्पृश्यों के लिए बंद कर दिए गए। पुनः मंदिर का द्वार खोलने का कार्य निरर्थक कार्य भी हो सकता है। ऐसे सैंकड़ों-हजारों मंदिर हैं, जहां कोई पूजा-अर्चना होती ही नहीं। वहां केवल गधे लोटते हैं। नासिक और वाई जैसे तीर्थस्थलों पर भी ऐसे मंदिर देखे जा सकते हैं। यदि ऐसे मंदिर का द्वार खोले जाने की घोषणा की जाती है तो वह न केवल निरर्थक कार्य है, बल्कि अस्पृश्यों का अपमान भी है। यदि पूजा-अर्चना