11. गांधी और उनका अनशन - Page 317

302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मंदिरों के कपाट खोल जाने के सच्चे मामले इनेगिने हैं। मंदिरों को खोले जाने के बारे में प्रकाशित अधिकांश खबरें केवल झूठा प्रचार-प्रसार है। यह बात श्री रंगा अय्यर के मंदिर-प्रवेश विधेयक की दुर्दशा से स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने यह विधेयक 1934 में केंद्रीय विधान-मंडल में प्रस्तुत किया था। मैं उस विधेयक के बारे में बाद में चर्चा करूंगा।

IV

इसके साथ ही मैंने इस विषय पर चर्चा समाप्त कर दी होती। लेकिन श्री गांधी का आग्रह है कि हिंदुओं में एक आध्यात्मिक जागृति आ गई है और वह ट्रावनकोर की मंदिर-प्रवेश उद्घोषणा के प्रति आश्वस्त हैं। अतः मुझे बाध्य होकर इस दावे की चर्चा करनी ही होगी।

मंदिर-प्रवेश की सफलता को खोले गए मंदिरों की संख्या से नहीं आंका जा सकता। उसका आकलन तो केवल उसके उद्देश्य के संदर्भ में किया जा सकता है। क्या उद्देश्य आध्यात्मिक हैं? केवल यही एकमात्र कसौटी हो सकती है।

अब मेरा कहना है कि मंदिर-प्रवेश आध्यात्मिक कार्य नहीं है। वह तो राजनीतिक चाल है।

क्या श्री गांधी आध्यात्मिक उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं? हिंदुओं से अपील करते हुए श्री गांधी ने कहाः

मैं आप लोगों से जो अपील कर रहा हूं, वह मेरी आत्मा की व्यथा से उत्पन्न

हुई है। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप भी उस व्यथा और लज्जा को अनुभव

करें और मेरे साथ सहयोग करें, क्योंकि मेरा और कोई लक्ष्य नहीं है, सिवाय

इसके कि ‘सनातम धर्म’ का पुनरुद्धार हो और उन करोड़ों लोगों के जीवन में

उसके यथार्थ रूप से उसकी स्थापना हो, जो फिलहाल मुझे लगता है कि मुझे

इस कार्य से वंचित कर रहे हैं।

आत्मा की इस व्यथा का जन्म पूना समझौते के बाद हुआ। पूना समझौते से पूर्व मंदिर-प्रवेश के बारे में श्री गांधी के क्या विचार थे? पूना समझौते से पूर्व श्री गांधी का विचार कुछ और ही था। वह विचार भी पूना समझौते से कुछ पूर्व व्यक्त किया गया था। हिंदुओं के नाम जिस अपील से मैंने उद्धरण दिया है, उसे भी अधिक समय नहीं हुआ था। उसे ‘गांधी शिक्षण’, खंड 2, पृ. 132 में व्यक्त किया गया था। तब श्री गांधी की राय थी कि अस्पृश्यों के लिए अलग मंदिर बनवाए जाएं। श्री गांधी ने कहा था ख्1, ः

  1. व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स, पृ. 107 से उद्धृत किया गया है। यह अंगे्रजी की

मूल पांडुलिपि में नहीं है µसंपादक।