गांधी और उनका अनशन
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यह कैसे संभव है कि अन्त्यज (अस्पृश्य) की सभी विद्यमान मंदिरों में प्रवेश
का अधिकार मिले? जब तक वर्ण-व्यवस्था और आश्रम के नियम का हिंदू धर्म
में प्रमुख स्थान है, यह कहना कि हर हिंदू हर मंदिर में प्रवेश कर सकता है,
ऐसी बात है जो फिलहाल तो संभव नहीं है।
यह जाहिर है कि मंदिर-प्रवेश उनका मूल विचार नहीं है और इसलिए आध्यात्मिक नहीं है। व्यथा तो पृथक निर्वाचक-मंडलों के लिए अस्पृश्यों की मांग की गंभीर और अचानक उत्तेजना से उत्पन्न हुई है। श्री गांधी पृथक निर्वाचक-मंडलों में निहित सिद्धांत से सिहर उठे थे। उनका विचार था कि इस सिद्धांत को लागू किया जा सकता है और हो सकता है कि अंततः हिंदू समाज से अस्पृश्यों का अलगाव और विच्छेद हो जाए। इस प्रयास को निष्प्रभावी करने के लिए उन्होंने अपनी राय बदल दी और मंदिर-प्रवेश का अभियान छेड़ दिया। श्री गांधी का उद्देश्य राजनीति से प्रेरित है और उसमें कोई आध्यात्मिकता नहीं है।
श्री गांधी ने जो पैंतरा बदला है, केवल उसी साक्ष्य को मैं अपने निष्कर्ष का आधार नहीं बनाना चाहता। उसके समर्थन में और भी कुछ बहुत-सा साक्ष्य है।
सबसे पहले मैं गुर्वायूर मंदिर सत्याग्रह का उल्लेख करूंगा। उसे कैल्लप्पन नामक एक सवर्ण हिंदू ने शुरू किया था। उद्देश्य था कि गुर्वायूर मंदिर में अस्पृश्यों का प्रवेश कराया जाए। इस कथानक के कुछ तथ्य रुचिकर सिद्ध हो सकते हैं।
जब इस मामले में रुढि़वादी हिंदुओं ने श्री गांधी को चुनौती दी तो अंततः उन्होंने जो रवैया अपनाया, वह उल्लेखनीय है। श्री गांधी रूढि़वादियों के साथ समझौते के लिए तैयार हो गए। समझौते की शर्तें इस प्रकार थीं। समाचार-पत्रों में प्रकाशित श्री गांधी के शब्दों में ही मैं उन्हें दे रहा हूं ख्1, ः
दिवस के किसी निश्चित समय में गुर्वायूर मंदिर के कपाट हरिजनों तथा उन
अन्य हिंदुओं के लिए खोले जाएं जिन्हें हरिजनों की उपस्थिति पर कोई आपत्ति
नहीं है और किसी अन्य निश्चित समय में उसे उन लोगों के दर्शनार्थ आरक्षित
कर दिया जाए जिन्हें हरिजनों के प्रवेश पर आपत्ति है। इस सुझाव की स्वीकृति
में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि गुर्वायूर में कृतिकाई एकादशी पर्व
के अवसर पर हरिजनों को हिंदुओं के साथ-साथ प्रवेश की अनुमति दी जाती
है और उसके बाद मंदिर या देवमूर्ति की शुद्धि की जाती है।
जब पूछा गया कि क्या उनका सुझाव था कि हरिजनों के प्रवेश के बाद प्रतिदिन मंदिर की शुद्धि की जाए तो श्री गांधी ने उत्तर दियाः
- टाइम्स ऑफ इंडिया, 3 जनवरी, 1933