11. गांधी और उनका अनशन - Page 319

304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

व्यक्तिगत रूप से मैं किसी भी शुद्धि के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन यदि शुद्धि

से आपत्ति करने वालों की अंतरात्मा को संतोष मिलता हो, तो मैं इस मामले में

व्यक्तिगत रूप से शुद्धिकरण पर कोई आपत्ति नहीं करूंगा। यदि शुद्धिकरण का

कोई महत्व है, तो विभिन्न धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित विभिन्न कारणों से दैनिक

दूषण की अनेकानेक संभावनाएं हो सकती हैं और दैनिक शुद्धिकरण हो सकता

है, चाहे हरिजनों को प्रवेश की अनुमति दी जाए या नहीं।

यह दृष्टिकोण आध्यात्मिक नहीं है। यह शत-प्रतिशत व्यावसायिक है। श्री गांधी ने भी इसे लगभग स्वीकार किया है। यह पूछे जाने पर कि उन्होंने जो समझौता सुझाया है, क्या वह अस्पृश्यों और सवर्ण हिंदुओं के बीच विभेद को अब भी बरकरार नहीं रखता, श्री गांधी ने समाचार के अनुसार कहा हैः

हरिजनों का रवैया यह होना चाहिए, ‘यदि कोई व्यक्ति मेरी उपस्थिति पर

आपत्ति करता है तो उसकी आपत्ति का मैं तब तक सम्मान करना चाहूंगा,

जब तक कि वह (आपत्तिकर्ता) मेरे अधिकार से मुझे वंचित नहीं करता

और जब तक उन लोगों के साथ-साथ, जिन्हें मेरी उपस्थिति पर आपत्ति नहीं

है, पूजा-अर्चना के समय में मेरी वैध भागीदारी की अनुमति दी जाती है, मैं

संतुष्ट रहूंगा।’

मुझे मालूम नहीं कि कोई स्वाभिमानी अस्पृश्य श्री गांधी के इस दृष्टिकोण को स्वीकार करेगा। इन शर्तों पर तो कुत्तों और बिल्लियों को भी सभी मंदिरों में प्रवेश करने दिया जाता है, जब कि वहां मानव-प्राणी नहीं होते। दो विरोधी वर्गों की परस्पर विरोधी मांगों के बीच तालमेल बिठाने के उद्देश्य से पूजा हेतु ईश्वर के घर को देश और काल में विभाजित करना अपने आपमें एक विचित्र और बेतुका विचार है। जाहिर है कि श्री गांधी भूल गए कि एक ही मंदिर में अलग से पूजा-अर्चना करना और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करना दो अलग-अलग बाते हैं। मंदिर-प्रवेश को यदि आध्यात्मिक रूप प्रदान करना है तो सामूहिक पूजा-अर्चना को मार्ग अपनाना ही होगा। पूर्ववर्ती मांग का अर्थ है कि एक वर्ग की उपस्थिति दूसरे को नहीं सुहाती और वह दोनों के हितों में समंजन करने का प्रयास करता है। उत्तरवर्ती मार्ग में यह निहित है कि दोनों वर्गों के बीच कोई घृणा नहीं है और वे स्वीकार करते हैं कि दोनों के भीतर मानवता का उभयनिष्ट अंश विद्यमान है।

इससे पता चल जाता है कि श्री गांधी के प्रयोजनों के पीछे आध्यात्मिक प्रेरणा नहीं है। वह तो इस बात के लिए उतावले हो रहे हैं कि अस्पृश्यों को जल्दी से जल्दी घेरकर हिंदू अस्तबलों में ठूंस दिया जाए, ताकि वे इधर-उधर भाग न सकें। श्री गांधी का दावा है कि वह आध्यात्मिक प्रेरणा से कार्य कर रहे हैं, पर उनके इस