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गांधी और उनका अनशन

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दावे को झुठलाने के लिए एक और साक्ष्य है। वह है, उनका रवैया, जो उन्होंने श्री रंगा अय्यर के ‘मंदिर-प्रवेश विधेयक’ के सिलसिले में अपनाया है। उससे पता चलता है कि आत्मा की व्यथा तो केवल लुभावनी लच्छेदार अभिव्यक्ति है, तथ्य नहीं।

विधेयक के प्रारूपकार श्री रंगा पर अंततः जो वज्रपात हुआ, उसे समझने के लिए इस विधेयक के कुछ इतिहास को जान लेना जरूरी है।

नए संविधान के लागू होने के बाद से कांग्रेस की सरकारों ने दो प्रांतों में दो विधेयक पारित किए हैं। एक बंबई में और दूसरा मद्रास में। अधिनियमों में कोई सारतत्व नहीं है। वे मंदिरों के कपाट खोले जाने की घोषणा नहीं करते। वे अपने प्रबंध के अधीन मंदिरों के न्यासियों को अनुमति देते हैं कि यदि वे चाहें तो ऐसा करें। चूंकि न्यासियों को विवश करने के लिए कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है, अतः ये अधिनियम केवल रद्दी कागज के टुकड़े हैं, उसके अलावा कुछ नहीं है। लेकिन मद्रास अधिनियम का कुछ इतिहास है, जो पहेली-सी बूझता है। अधिनियम को पारित कराने वाले मद्रास के प्रधानमंत्री श्री राजगोपालाचारी हैं। उनका कांग्रेस में बड़ा ऊंचा स्थान है। वास्तव में तो वह इतना ऊंचा है कि लोग उन्हें उप-महात्मा कहते हैं। यदि कोई पहेली का समाधान खोज सके, तो समाधान के प्रारूपकार के और श्री गांधी के मन का पता चल जाएगा, जिन्होंने इस सबको अनुप्राणित किया है।

आइए, अब ट्रावनकोर मंदिर-प्रवेश पर विचार करें 12 नवंबर, 1936 को महाराजा ने मंदिर को अस्पृश्यों के लिए खोले जाने की उद्घोषणा की। वह एक शानदार दस्तावेज है। उसमें कहा गया हैः

अपने धर्म की सत्यता और वैधता के प्रति परम श्रद्धा रखते हुए, यह विश्वास

करते हुए कि वह दैवी मार्गदर्शन और सर्वव्यापी सहिष्णुता पर आधारित है, यह

जानते हुए कि व्यवहार में वह सदियों से परिवर्तनशील समय की मांग के अनुरूप

स्वयं को ढालता रहा है_ यह ध्यान रखते हुए कि हमारी हिंदू प्रजा में से कोई भी

जन्म, जाति और संप्रदाय के आधार पर हिंदू धर्म की सांत्वना और सहानुभूति से

वंचित न रहे, हम निर्णय करते हैं और इसके द्वारा घोषणा करते हैं और सभादेश

व आदेश देते हैं कि ऐसी शर्तों और नियमों के अधीन रहते हुए जिन्हें हम अपने

मंदिरों में समुचित वातावरण को बनाए रखने और उनके कर्मकांड के पालन के

लिए निर्धारित करें और लागू करें इसके तुरंत बाद हमारे तथा हमारी सरकार

द्वारा नियंत्रित मंदिरों में किसी हिंदू पर जन्म और धर्म के आधार पर मंदिर-प्रवेश

या उसमें पूजा करने संबंधी कोई रोकटोक न हो।