सभ्यता या घोर असभ्यता
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पुराने ढर्रे पर चलते रहे। उसने उसके ऋषियों की दृषि् की क्षीण कर दिया है,
जिसके कारण ये झूठे बिम्बों को असलियत मान बैठे।.... वह अंहकार, आडंबर,
वाक्जाल और क्षीण दृषि् है। वह अपने स्फुट विचारों को भगवद् संदेश कहती
है और अपने विलक्षण शब्दों के द्वारा सिद्धांतों का महान व अभेद्य भवन खड़ा
करती है।...... उपनिषद उसकी यह व्याख्या करने का दावा करते हैं, जिसे जान
लेने से सब-कुछ जान लिया जाता है। ‘परब्रह्म’ संबंधा यह मध्ययुगीन जिज्ञासा
ही भारत की समूची उच्च अध्यात्म विद्या का आधार है। कल्पना की बेतुकी,
उड़ानों, विचित्र भ्रांतियों और अंटशंट अटकलबाजियों से ग्रंथ-के-ग्रंथ भरे पड़े
हैं। और हम हैं कि अभी तक नहीं समझ पाए हैं कि वे व्यर्थ हैं। ‘समाधि’
अथवा मूर्च्छा को आध्यात्मिक प्रगति का चरम बिंदु माना जाता है। यह कितने
आश्चर्य की बात है कि मूर्च्छा की क्षमता को बुद्धिमत्ता का लक्षण माना जाए।
यदि भावना प्रधान हो और विवेक गौण हो तो चेतना खो बैठना कौन बड़ी बात
है। यही कारण है कि मामूली-से-मामूली उद्धिग्नता से भी महिलाएं बेहोश हो
जाती हैं। लेकिन भारत में -समाधि’ योग का आठवां अंग या सीढ़ी है और उसे
केल ‘परमहंस’ ही प्राप्त करता सकता है। हे इजरील, क्या यही तुम्हारे देवता
हैं, नकली रीति से उत्पन्न की गई असामान्य मनोदशा को ज्ञान प्राप्ति का संकेत
मानना ऐसी गलती है, जो केवल भारतीय दार्शनिक ही कर सकते हैं।
विज्ञान, कला और कौशल के क्षेत्र में हिंदू सभ्यता का योगदान अति आदिम स्वरूप का है। बुनाई, कताई आदि के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर शेष में हिंदू सभ्यता ने ऐसी कोई तकनीक ईजाद नहीं की है, जो प्रकृति के विरुद्ध मानव के संघर्ष में उसकी मदद कर सके और वह ऐसा जीवन-स्तर प्राप्त कर सके, जिसे बर्बर युग के स्तर से ऊंचा कहा जा सके। इसका कारण है। वैज्ञानिक और तकनीकी साधन हैं ही नहीं। पल्ले न पड़ने वाली समूची आध्यात्मिक बकवास हम पर थोपी जा रही है। अतः सभी युगों में इस देश को अकाल रौंदते रहे हैं। अज्ञान, अंधविश्वास आदि मन के विकार और मलेरिया, प्लेग आदि तन के विकास युग-युग से इस देश के लिए मानो कफन रहे हैं।
धर्म और आचार-शास्त्र के क्षेत्र में हिंदुओं ने सर्वाधिक प्रयास किए हैं। उनका जो योगदान है, उसमें वे सबसे अधिक विकसित हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे मनुष्य के लिए अति आवश्यक हैं। उसका सीधा-सा कारण यह है कि वे मनुष्य के मन में विचार और कर्म के बीज बोते हैं। वे ही जीवन के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को तराशते हैं। वे ही अपने साथी के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को संवारते हैं। वे उसके आचरण एवं चरित्र को ढालने वाले सिद्धांत तय करते हैं। वे ही मनुष्य के मन में