18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विवेक जैसे रहस्यमय बीज का आरोपण करते हैं। विवेक ही पहरेदार है और उसे गलत रास्ते पर नहीं जाने देता।
जब हम इस हिंदू सभ्यता को उसके अपने धार्मिक दृष्टिकोण और उसके अपने जीवन-दर्शन की कसौटी पर कसते हैं तो हमें शंका होने लगती है कि क्या इस हिंदू सभ्यता का कोई लाभ उन पीढि़यों को है, जिन्हें वह विरासत में मिलेगी ही? आदिम जातियों के जो ढाई करोड़ लोग इसकी परिधि मे हैं, उन्हें यह सभ्यता क्या देती है? इस सभ्यता की परिधि के बीच जरायम-पेशा जातियों के जो 50 लाख लोग रह रहे हैं, उन्हें यह सभ्यता क्या देती है? इस सभ्यता के अंतर्गत जो पांच करोड़ अस्पृश्य न केवल रह रहे हैं, बल्कि जिन्हें इस सहन करना पड़ रहा है, उन्हें वह क्या देती है? ऐसी सभ्यता के बारे में आदिम जातियां क्या कहेंगी, जिन्हें उसने अपने में शामिल करने का कोई प्रयास नहीं किया है? ऐसी सभ्यता के बारे में जरायम-पेशा जातियां क्या कहेंगी, जिन्हें खदेड़कर उसने विवश कर दिया है कि वे अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए जुर्म को अपना धंधा बना लें? यदि वे कहें कि यह सभ्यता नहीं, अपितु सभ्यता के नाम पर कलंक है, तो क्या यह अनुचित होगा?
जहां तक अस्पृश्यों का संबंध है, उनका तो सदैव दुर्भाग्य रहा है। हिंदू सभ्यता के अधीन पहले भी वे घोर अपमान और घोर अभाव की चक्की में पिसते रहे हैं, और भविष्य में भी उनके लिए आशा की कोई किरण नहीं है कि अस्पृश्यता की इस व्यवस्था में कितना घोर अपमान और कितना घोर अभाव मौजूद है। 1928 में दलित वर्गों तथा आदिम जातियों की शिकायतों की जांच करने के लिए बंबई सरकार ने जो कमेटी नियुक्त की थी, उसके विचार इस संबंध में अति संगत हैं। उसमें कहा गया हैः
यहां कोई विचित्र बात नहीं कि अस्वच्छ व्यक्ति या वस्तु घृणा पैदा करती है,
क्योंकि यह प्रदूषण का आधार है। लेकिन जिस रीति से यह भावना (अस्पृश्यों) प्र
लागू की जाती है, उसकी अतार्किकता खेदजनक है। वह किसी व्यक्ति प्र केवल
जन्म के आधार पर ही अस्पृश्य का ठप्पा लगा देती है। जो व्यक्ति अस्पृश्य के
यहां पैदा हुआ है, वह अस्पृश्य ही रहता है, भले ही वह निजी सफाई के मामले
में तथाकथित स्पृश्य से कितना भी स्वच्छ क्यों न हो। उसके सामने अपनी इस
स्थिति से बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। इस सबमें अचरज की बात
तो यह है कि रूढि़वादी हिंदू इस बात के बावजूद कि उसकी व मुसलमानों,
पारसियों और ईसाइयों की धार्मिक-धारणाओं, जीवन-शैली तथा जीवन-दृष्टि में
अंतर होते हैं, उन्हें स्पृश्य मानता है। इस कारण (अस्पृश्यों ) की स्थिति और
खराब हो गई। रूढि़वादी हिंदुओं के इस अनुचित भेदभाव के कारण कुछ मामलों