306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस उद्घोषणा में कौन-सी आध्यात्मिकता है?
यह उद्घोषणा ट्रावनकोर के महाराजा ने अपने नाम से जारी की थी। लेकिन इसके पीछे यथार्थ सक्रिय शक्ति थी, प्रधानमंत्री सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर की। हमें उनके प्रयोजनों को समझना ही होगा। 1933 में भी सर सी.पी. आर. अय्यर ट्रावनकोर के प्रधानमंत्री थे। 1933 में श्री गांधी गुर्वायूर मंदिर को सभी अस्पृश्यों के लिए खुलवाने का संघर्ष कर रहे थे। मंदिर-प्रवेश के मसले पर हुए विवाद में जिन अनेक लोगों ने भाग लिया, उनमें सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर भी थे। लगता है कि सब लोग इस तथ्य को भूल गए हैं। लेकिन उसका स्मरण जरूरी है, क्योंकि इसके सहारे हम उन प्रयोजनों को भांप सकते हैं, जिन्होंने उन्हें इस उद्घोषणा की जारी करने के वास्ते महाराजा पर दबाव डालने के लिए प्रेरित किया। 1933 में इस मामले के बारे में सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर का क्या रवैया था? उन्होंने प्रेस के लिए जो निम्न वक्तव्य ख्1, जारी किया था, उससे उनका रवैया स्पष्ट हो जाएगाः
व्यक्तिगत रूप से मैं जातिप्रथा के नियमों का पालन नहीं करता। मैं अनुभव
करता हूं कि इस मामले के बारे में उन लोगों के मन में, जो यह विश्वास करते
हैं कि मंदिरों में पूजा-अर्चना की वर्तमान पद्धति और उसका ब्यौरा दैवी आदेशों
पर आधारित है, यद्यपि अति स्पष्ट भावनाएं नहीं हैं, पर प्रबल तो हैं ही। समस्या
का स्थाई समाधान तभी खोजा जा सकता है, जब आपसी तालमेल की प्रक्रिया
अपनाई जाए और वर्तमान स्थिति की वास्तविकताओं के प्रति हिंदू समाज के
धार्मिक तथा सामाजिक नेताओं में जागृति पैदा की जाए और उन्हें बताया जाए
कि हिंदू समाज की अखंडता को बनाए रखना जरूरी है।
आकस्मिक आघातों से प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। राजनीतिक क्षेत्र की अपेक्षा
इस क्षेत्र में सीधी कार्यवाही और भी अधिक घातक सिद्ध होगी। मेरा दुर्भाग्य है
कि मैं श्री गांधी की इस बात से सहमत नहीं हो सकता कि मंदिर-प्रवेश की
समस्या को सहभोज जैसे विषयों से अलग किया जा सकता है। मैं डॉ. अम्बेडकर
की इस बात से सहमत हूं कि दलित वर्गों के सामाजिक तथा आर्थिक उत्थान
के कार्यक्रम को हमें तुरंत हाथ में लेना चाहिए।
- यह वक्तव्य डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक, व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू दि अनटचेबिल्स, पृ. 318
से उद्धृत किया गया है। मूल अंगे्रजी की मूल पांडुलिपि में इसका उल्लेख नहीं है µ संपादक।