गांधी और उनका अनशन
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इस वक्तव्य से पता चलता है कि 1933 में सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर के मन में आध्यात्मिक प्रेरणाएं नहीं थीं। आध्यात्मिक प्रेरणाएं तो 1933 के बाद जागृत हुईं। क्या इसका कोई विशेष कारण है कि आध्यात्मिक प्रेरणाओं ने 1936 में जन्म लिया?
इस प्रश्न का उत्तर मिल सकता है, यदि हम इस बात को ध्यान में रखें कि 1936 में ट्रावनकोर में एजावा समुदाय के लोगों का सम्मेलन हुआ था। उसमें धर्मान्तरण के उस प्रश्न पर विचार किया गया, जिसे मैंने 1935 में येवला में उठाया था। एजावा अस्पृश्य लोग हैं और वे समूचे मलाबार में पाए जाते हैं। वह पढ़ा-लिखा समुदाय है और आर्थिक रूप से भी काफी सशक्त है। वह समुदाय मुखर भी है और इस देशी राज्य में सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करता रहा है। एजावा बहुत बड़ा समुदाय है। इतने बड़े समुदाय का विच्छेद हिंदुओं के लिए मौत का संदेश ही होता। सम्मेलन ने खतरे को वास्तविक तथा तात्कालिक बना दिया था। इस खतरे ने ही सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर के रवैए के रुख को बदल दिया था। आध्यात्मिक प्रेरणाओं का तो केवल मुखौटा है। वे वास्तविक नहीं थीं।
इस उद्घोषणा के फलस्वरूप तथ्यों में कितना परिवर्तन हुआ और कितना दिखावा-भर रहा? ट्रावनकोर में विद्यमान वास्तविक तथ्यों का पता लगाना संभव नहीं है। मद्रास विधान सभा में जब मलाबार मंदिर-प्रवेश विधेयक पर चर्चा हुई थी तो उसके दौरान सर टी. पन्नीरसेल्वम ने ट्रावनकारे संबंधी कुछ तथ्यों का उल्लेख किया था। यदि वे सही हैं तो उनसे पता चलेगा कि समूची बात ढोल की पोल है। सर टी. पन्नीरसेल्वम ने कहा थाः
प्रधानमंत्री ने विधेयक के समर्थन में एक तर्क यह भी दिया है कि ट्रावनकोर
में मंदिरों के कपाट ‘अस्पृश्यों’ के लिए खोल दिए गए हैं। निरंकुश अधिकारों
से संपन्न एक महाराजा ने आदेश द्वारा ऐसा किया। लेकिन उस आदेश का वहां
कैसा पालन हो रहा है? जो अभ्यावेदन प्राप्त हुए हैं, उनसे उन्हें विश्वास हो चला
है कि उत्साह के पहले वेग के पश्चात् हरिजनों ने मंदिर जाना बंद कर दिया
है। हरिजनों को मंदिर-प्रवेश की अनुमति दिए जाने से पूर्व जो लोग पूजा-अर्चना
के लिए जाया करते थे, वे अब पूजा-अर्चना के लिए मंदिरों में नहीं जाते। मैं
सरकार से पूछना चाहूंगा कि क्या उक्त मंदिर-प्रवेश ट्रावनकोर में वास्तव में
सफल रहा है।
विधेयक के तीसरे वाचन के समय सर टी. पन्नीरसेल्वम ने एक वक्तव्य दिया, जो निश्चय ही अनेक लोगों को अचरज-भरा लगा होगा। उन्होंने कहा थाः