11. गांधी और उनका अनशन - Page 323

308 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं जानना चाहूंगा कि क्या यह सच है कि बड़ी महारानी के निजी मंदिरों को

उस उद्घोषणा से मुक्त रखा गया है। इसका क्या कारण है? मुझे ऐसा बताया गया

है कि पुनः बड़ी महारानी की पुत्री के विवाहोत्सव पर मंदिर के शुद्धिकरण की

आवश्यकता अनुभव की गई। यदि मंदिरों का ऐसा शुद्धिकरण हुआ तो उद्घोषणा

का क्या हुआ?

इन तथ्यों को प्रधानमंत्री ने चुनौती नहीं दी। जाहिर है कि उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती। यदि वे अकाट्य हैं तो मलाबार मंदिर-प्रवेश संबंधी उद्घोषणा को आध्यात्मिक विधान न कहा जाए, यह बेहतर ही होगा।

मंदिर-प्रवेश संबंधी इस आंदोलन के बारे में कुछ अस्पृश्यों ने जो आशंका प्रकट की है, उसका उल्लेख किए बिना इस चर्चा को समाप्त करना उचित नहीं होगा। उनकी आशंका है कि वह मात्र समाज-सुधार का आंदोलन है या फिर रणनीति है?

राजनीति, शिक्षा और सेवाओं के मामले में अस्पृश्यों को विशेषाधिकार मिले हैं, उनका आधार यह तथ्य है कि वे अस्पृश्य हैं। यदि वे अस्पृश्य नहीं रहते तो इन विशेषाधिकारों की उनकी मांग को तुरंत चुनौती दी जा सकती है। यदि वे अस्पृश्य नहीं रहते तो वे केवल निर्धन और पिछड़े रह जाएंगे। लेकिन निर्धन एवं पिछड़े होने के नाते वे अस्पृश्यों की भांति किसी विशेषाधिकार के पात्र नहीं रह जाएंगे। मंदिर-प्रवेश के इन पक्षधरों की कूट योजना क्या है? क्या वह केवल मंदिरों के द्वार खोलने की है या उसका लक्ष्य है कि अंततः विशेषाधिकारों का हरण कर लिया जाए? अनेक मननशील अस्पृश्यों के मानस में यह आशंका बनी हुई है। यह आशंका वास्तविक आशंका है, यह बात स्वयं ट्रावनकोर के घटनाक्रम से स्पष्ट हो जाती है। मुझे अपने एक संवाददाता का दिनांक 24 नवंबर, 1938 का पत्र प्राप्त हुआ है। वह अखिल ट्रावनकोर पुलयार चेरमार आयकिया महासंगम का प्रतिनिधि है। उसके पत्र का पूरा मूलपाठ में नीचे उद्धृत कर रहा हूंः

सेवा में

डॉ. अम्बेडकर, कैम्प माय्यनाड,

बंबई 24-11-1938

क्विलोन।

माननीय महोदय,

मैं सहज प्रसन्नता से आपका ध्यान निम्न तथ्यों की ओर दिलाना चाहता हूं और आपसे मूल्यवान परामर्श प्राप्त करना चाहता हूं। देशी ट्रावनकोर राज्य में हरिजन समुदाय का नेता होने के नाते यह मेरा परम कर्तव्य है कि निश्चय ही उन सभी कष्टों की