12. अस्पृश्यों को चेतावनी - Page 328

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अस्पृश्यों को चेतावनी

दुनिया के सभी देशों के निर्धनों के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वे सुस्थापित व्यवस्था के विरुद्ध एवं विप्लव करें। उनके इतिहास का अध्येता उनके इस विचार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा कि उन्हें किस प्रकार विजय प्राप्त होगी। धर्मपरायण युग में निर्धन इस आशा पर जीवित रहते थे कि अंततः आध्यात्मिक शक्तियां विनम्रों को पृथ्वी पर उनका उत्तराधिकार दिलाएंगी। धर्मनिरपेक्ष युग में जिसे अन्यथा आधुनिक युग कहते हैं, निर्धन इस आशा पर जीवित रहते हैं कि ऐतिहासिक भौतिकवाद की शक्तियां स्वतः बलवान से उसका बल छीन लेंगी और उनके स्थान पर निर्धनों को बिठा देंगी।

इस मनोविज्ञान की दृष्टि से जब हम हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोहियों की भूमिका में अस्पृश्यों की कल्पना करने लगते हैं तो हमारा मन उन्हें उनकी इस अनुभूति के लिए बधाई देना चाहता है कि न तो आध्यात्मिक शक्तियां और न ही ऐतिहासिक शक्तियां सतयुग ला पाएंगी। वे भली-भांति जानते हैं कि यदि हिंदू समाज-व्यवस्था धराशायी हो सकती है तो वह केवल दो दशाओं में हो सकती है। एक तो यह कि उस पर लगातार प्रहार होता ही रहना चाहिए। दूसरी यह कि वे उस पर लगातार प्रहार तभी कर सकते हैं, जब वे विचार तथा कार्य में हिंदुओं के बंधन से मुक्त हों। इसी कारण अस्पृश्य आग्रह कर रहे हैं कि उनके लिए पृथक निर्वाचक-मंडलों और पृथक बंदोबस्तों की व्यवस्था हो।

दूसरी ओर हिंदू यह बता रहे हैं कि अस्पृश्य अपनी मुक्ति के लिए हिंदुओं पर निर्भर रहें। अस्पृश्यों से कहा जा रहा है कि शिक्षा के सामान्य प्रसार से हिंदू तर्कसंगत ढंग से आचरण करने लगेंगे। अस्पृश्यों से कहा जा रहा है कि अस्पृश्यता के विरुद्ध सुधारकों के सतत् प्रचार से निश्चय ही हिंदुओं का नैतिक कायाकल्प हो जाएगा और उनकी अंतरात्मा जाग जाएगी। अतः अस्पृश्यों को हिंदुओं की सद्भावना और कर्तव्य-परायणता पर भरोसा करना चाहिए। इस बात पर कोई भी अस्पृश्य विश्वास नहीं करता। यदि ऐसा करने वाले कोई हैं तो वे पाखंडी हैं और हिंदुओं की हां में