314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हां मिलाने के लिए तैयार हैं, ताकि हिंदुओं की अनुकंपा से वे अस्पृश्यों के लिए आरक्षित सीटें हथिया सकें। वे अस्पृश्यों के ऐसे परभक्षी गिरोह हैं, जो किसी भी सुलभ साधन से स्वयं को समृद्ध करना चाहते हैं।
अस्पृश्य ऐसी झूठी आशाओ और झूठे प्रचार के बहकावे में नहीं आते। अतः इस पर टिप्पणी करना जरूरी है। साथ ही यह प्रचार इतना लुभावना है कि असावधान अस्पृश्यों को पथभ्रष्ट करके उन्हें अपने जाल में फांस सकता है। अतः अस्पृश्यों को चेतावनी देना जरूरी है।
सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए सामाजिक आदर्शवादी दो एजेंसियों प्र भरोसा करते हैं। एक है बुद्धि और दूसरी है धर्म।
बुद्धि को अपना मिशन मानने वाले बुद्धिवादियों का विचार है कि बौद्धिक शक्ति को बढ़ाकर अन्याय को मिटाया जा सकता है। मध्य-युग में सामाजिक अन्याय और अंधविश्वास का एक-दूसरे से गहरा नाता था। बुद्धिवादियों की यह सोच स्वाभाविक है कि अंधविश्वास को मिटाने से अन्याय मिट ही जाएगा। परिणामों ने इस विश्वास को पक्का किया है। आज जो शिक्षाविदों, दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों तथा समाज-विज्ञानियों का यह सिद्धांत बन गया है कि व्यापक शिक्षा तथा मुद्रण और प्रेस के विकास से एक आदर्श समाज की स्थापना हो जाएगी। उसमें हर व्यक्ति इतना जागृत हो जाएगा कि वहां सामाजिक अन्याय होगा ही नहीं।
इतिहास, चाहे भारत का हो या यूरोप का, इस सिद्धांत को पूर्ण समर्थन प्रदान नहीं करता। यूरोप में ऐसी पुरानी परंपराओं तथा अंधविश्वासों का खात्मा हो गया है, जो 18वीं सदी में अन्याय के मूलाधार लगते थे। फिर भी सामाजिक अन्याय का बोलबाला है और सदा ही तथा शीघ्र ही पनपता रहा है। स्वयं भारत मे ही समूची ब्राह्मण जाति, उसके पुरुष-स्त्री और बच्चे शिक्षित हैं। लेकिन ऐसे कितने ब्राह्मण हैं, जो अस्पृश्यता की धारणा से मुक्त हैं? उनमें से ऐसे कितने हैं, जो अस्पृश्यता के खिलाफ जेहाद छेड़ने के लिए आगे आए हैं? उनमें में से कितने अन्याय के विरुद्ध अस्पृश्यों के संघर्ष में उनका साथ देने के लिए तैयार हैं? संक्षेप में, कितने ब्राह्मण हैं, जो अस्पृश्यों के ध्येय को अपना ध्येय बनाने के लिए तैयार हैं? संख्या नगण्य होगी।
क्या कारण है कि बुद्धि सामाजिक न्याय नहीं ला सकती? उत्तर है कि बुद्धि तभी काम करती है, जब तक कि किसी के निहित स्वार्थों से उसका टकराव नहीं होता। जहां वह निहित स्वार्थों से टकराती हैं, वहां वह निष्फल हो जाती है। अस्पृश्यता में अनेक हिंदुओं का निहित स्वार्थ होता है। वह निहित स्वार्थ सामाजिक उच्चता का