अस्पृश्यों को चेतावनी
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रूप धारण कर सकता है या बेगार और सस्ती मजूरी जैसे आर्थिक शोषण का रूप धारण कर सकता है। अतः यह तथ्य है कि अस्पृश्यता में हिंदुओं का निहित स्वार्थ है। यह स्वाभाविक ही है कि निहित स्वार्थ बुद्धि के आदेश को नहीं मानता। अतः अस्पृश्यों को यह समझ लेना चाहिए कि बौद्धिक कर्म की सीमाएं हैं।
धार्मिक प्रभाव में आस्था रखने वाले नैतिकतावादियों का आग्रह है कि मानव के मानस में धर्म जो नैतिक अंतरदृष्टि रोपता है, वह उसे उसके निजी कर्मों के पाप-भाव का और उसके द्वारा अपने बंधुओं के प्रति कर्तव्य का बोध कराती है। कोई भी इस बात का खंडन नहीं कर सकता कि धर्म का वह कर्म है और किसी हद तक धर्म उस ध्येय मे सफल हो सकता है। लेकिन यहां भी धार्मिक क्षमता की सीमाएं हैं। धर्म एक समुदाय के भीतर ही न्याय-भाव पैदा कर सकता है। धर्म समुदायों के बीच न्याय-भाव पैदा नहीं कर सकता। बहरहाल, धर्म अमरीका में नीग्रो लोगों और श्वेतों के बीच न्याय-भाव पैदा नहीं कर सकता है। वह जर्मनों और फ्रांसीसियों के बीच और उनके तथा अन्य राष्ट्रों के बीच न्याय-भाव पैदा नहीं कर सका। राष्ट्र की पुकार, समुदाय की पुकार, न्याय के लिए धर्म की पुकार से अधिक बलवान सिद्ध हुई है।
अस्पृश्यों को दो बातें ध्यान में रखनी चाहिएं। एक, आशा करना व्यर्थ है कि हिंदू धर्म सामाजिक न्याय लाने के मिशन को पूरा कर सकेगा। हो सकता है कि इस्लाम, ईसाई और बौद्ध धर्म इस महान कार्य को कर सकें। हिंदू धर्म तो अस्पृश्यों के प्रति विषमता और अन्याय का जीता-जागता नमूना है। उसके लिए तो न्याय के सिद्धांत का प्रचार करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाना है। उससे यह आशा करना मृगतृष्णा जैसी ही है। यदि मान भी लें कि हिंदू धर्म में इस कार्य को करने की पात्रता है, तो भी यह संभव नहीं है कि वह इस कार्य को पूरा कर सके। हिंदुओं और उनके परिजनों के बीच जो सामाजिक खाई है, उससे कहीं चौड़ी खाई अस्पृश्यों और उनके बीच है। धर्म किसी समुदाय अथवा राष्ट्र के भीतर कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, पर वह इन खाइयों को पाटकर उन्हें एक पूर्ण इकाई बनाने में नितांत अक्षम है।
बुद्धि और धर्म की इन एजेंसियों के अलावा अस्पृश्यों से यह भी कहा जाता है कि वे विशेषाधिकार प्राप्त हिंदुओं के उच्चादर्शों से मंडित स्वार्थों तथा हिंदू ‘सर्वहरा’ के भाईचारे पर भरोसा करें।
जहां तक विशषाधिकार प्राप्त वर्गों का संबंध है, उदार निरंकुशों से अधिक के लिए सहमत होना उनकी दृष्टि में गलत ही होगा। उनके अपने वर्ग हित हैं और उनसे आशा नहीं की जा सकती कि सामान्य हितों अथवा सार्वजनिक हितों पर वे उन्हें