सभ्यता या घोर असभ्यता
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में, खासकर गांवों में रूढि़वादी हिंदुओं के प्रभाव में आकर मुसलमान, पारसी
और ईसाई भी (अस्पृश्यों) के प्रति अस्पृश्यता का व्यवहार करते हैं, जब कि
उनके धर्म तो इसके विपरीत शिक्षा देते हैं। हमें सबसे अधिक चिंता इस बात
की है कि अस्पृश्यता में अलगाव और हीन भावना जैसी बुराइयां तो हैं ही, पर
साथ ही उससे कुछ खास बुराइंयां भी जुड़ी हुई हैं। तर्क की दृष्टि से देखा जाए
तो रूढि़वादी हिंदू समाज में अस्पृश्यता के कारण (अस्पृश्य) सरकारी स्कूल में
दाखिला नहीं पा सकेगा, भले ही स्कूल का खर्च सरकार उठाती हो। उसके कारण
वह सरकारी सेवाओं में नियुक्त नहीं हो सकेगा, भले ही वह उनके लिए योग्यता
रखता हो। वह केवल उन्हीं सेवाओं को कर सकेगा, जो रूढि़ के अनुसार उसके
लिए नियत की गई हैं। उसके कारण वह उन सार्वजनिक स्थानों से भी पानी
नहीं ले सकेगा, जिनका रखरखाव सरकारी खर्च से होता है। इस दृष्टि से देखा
जाए तो अस्पृश्यता केवल सामाजिक समस्या नहीं है, यह एक सबसे महत्वपूर्ण
राजनीतिक समस्या है और इसका सरोकार राज्य के नागरिक के अधिकारों के
बुनियादी सवाल से है।
यहां तो सिर्फ अस्पृश्यों की कठिनाइयां गिनाई गई हैं। लेकिन ये अस्पृश्य ही तो अपमान की जिंदगी नहीं बसर करते हैं। कुछ अन्य वर्ग भी हैं, और उनकी स्थिति और भी खराब है। अस्पृश्य उन्हें कहा जाता है, जो केवल शारीरिक स्पर्श से भ्रष्ट करते हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो तब भ्रष्ट करते हैं, जब वे निश्चित दूरी पर न रहकर पास आ जाते हैं। इन्हें सामीप्यवर्जित कहा जाता है। उनसे भी खराब स्थिति में वे लोग हैं, जिनको देखने मात्र से भ्रष्ट होने का पाप लग जाता है। ये दृष्टिवर्जित कहलाते हैं। नयाडी ख्1, लोग सामीप्यवर्जित लोगों की श्रेणी में आते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे कुक्कुरभक्षी होते हैं और हिंदुओं में सबसे अधम जाति के हैं। भीख मांगने में वे सबसे ज्यादा हठी लोग हैं। वे किसी भी व्यक्ति का, चाहे वे पैदल चले, सवारी करे, नौका-यात्रा करे, मीनों तक पीछा करेंगे और उससे दूर-दूर रहकर उसके पीछे-पीछे चलते जाएंगे। यदि उन्हें कोई चीज दी जाती है तो उसे भूमि पर ही रखना होगा और जब उसे देने वाला व्यक्ति पर्याप्त दूरी पर पहुंच जाएगा, तभी प्राप्त करने वाला व्यक्ति सहमता हुआ आगे बढ़ता है और उसे उठाता है। इन्हीं लोगों के बारे में श्री थर्स्टन कहते हैंः ‘मैंने इन लोगों (नयाडियों) को शोरानूर में देखा है। ये लोग तीन मील दूर रहते थे। लेकिन ये लोग प्रदूषण के कारण जो ये सदियों से ओढ़े चले आ रहे थे, नदी पर बने विशाल पुल से न चलकर, मीलों के चक्करदार रास्ते से आते-जाते थे।’
- मलाबर मैनुअल