13. हिंदुओं से अलगाव - Page 338

हिंदुओं से अलगाव

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के लिए इतनी भीड़ जमा हो गई कि एक बार में सैकड़ों लोगों को संस्कार की

शपथ दिलाई गई।

इतिहास गवाह है कि मजबूरी या धोखाधड़ी के कारण धर्म-परिवर्तन हुए हैं।

आज धर्म पैतृक संपत्ति का अंश हो गया है। विरासत की भांति ही वह पिता से पुत्र को मिलता है। ऐसे धर्म के परिवर्तन में क्या अनौचित्य है? अस्पृश्य यदि धर्म-परिवर्तन करेंगे ही, तो धर्म-मूल्य और विभिन्न धर्मों के सद्गुण पक्ष पर पूर्णतया विचार करके करेंगे। कैसे कहा जा सकता है कि ऐसा धर्म-परिवर्तन समुचित धर्म-परिवर्तन नहीं है? इसके विपरीत यह तो समुचित धर्म-परितर्वन के इतिहास की प्रथम घटना होगी। अतः यह समझ में नहीं आता कि अस्पृश्यों के धर्म-परिवर्तन पर किसी प्रकार की शंका क्यों की जाए।

तीसरी आपत्ति बेतुकी है। किसी ने भी यह स्पष्ट नहीं किया है कि धर्म-परिवर्तन के कारण अस्पृश्यों को कौन-सा राजनीतिक लाभ मिलेगा। यदि कोई राजनीतिक लाभ है भी तो किसी ने भी यह सिद्ध नहीं किया है कि धर्म-परितर्वन के लिए यह सीधा लालच है।

लगता है कि धर्म-परिवर्तन का विरोध करने वालों को इतनी भी जानकारी नहीं है कि दो प्रकार के लाभों में भेद करना होगा। एक लाभ तो वह है जो धर्म-परिवर्तन के लिए सीधे लालच से होता है और दूसरा लाभ वह है जो केवल संयोग से होता है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इन दो भेदों में अंतर नहीं है। हो सकता है कि धर्म-परिवर्तन के कारण अस्पृश्यों को कोई राजनीतिक लाभ मिल जाए। जहां लाभ सीधे लालच से हो, केवल उसी दशा में धर्म-परिवर्तन को अनैतिक अथवा आपराधिक ठहराया जा सकता है। अतः जब तक धर्म-परिवर्तन के विरोधी यह सिद्ध न कर दें कि अस्पृश्यों द्वारा अपेक्षित धर्म-परिवर्तन केवल राजनीतिक लाभ के लिए है, तब तक उनका आरोप निराधार है। यदि राजनीतिक लाभ केवल संयोगी लाभ है, तो धर्म-परिवर्तन में कुछ अनैतिकता नहीं है। फिर भी असलियत यह है कि धर्म-परिवर्तन से अस्पृश्यों को कोई नया राजनीतिक लाभ नहीं मिल सकता। भारत की संविधान-व्यवस्था के अनुसार हर धार्मिक संप्रदाय को पृथक राजनीतिक संरक्षण का अधिकार प्राप्त है। वर्तमान परिस्थिति में अस्पृश्यों को मुस्लिमों और ईसाइयों जैसे ही राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं। यदि वे अपना धर्म-परिवर्तन करते हैं तो उससे उनके लिए किन्हीं नए राजनीतिक अधिकारों का सृजन नहीं हो जाएगा। यदि वे धर्म-परिवर्तन नहीं करते, तो उनके वर्तमान राजनीतिक अधिकार ही बने रहेंगे। धर्म-परिवर्तन का राजनीतिक लाभ से कोई वास्ता नहीं है। यह आरोप मिथ्या है, जो बिना सोचे-समझे लगाया गया है।

दूसरी आपत्ति इस तर्क पर आधारित है कि सभी धर्म एक ही बात कहते हैं। इस तर्क से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि चूंकि सभी धर्म एक ही बात कहते