20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मद्रास प्रेसिडेंसी के तिन्नेवल्ली जिले में दृष्टिवर्जित लोगों का ऐसा वर्ग है, जिसे पुराडा वन्ना कहते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि ‘दिन में उन्हे बाहर आने की अनुमति नहीं है, क्योंकि उन पर दृष्टि पड़ने से ही आदमी भ्रष्ट हो जाता है। ये अभागे लोग निशाचरों जैसा जीवन जीने के लिए विवश हैं। वे अंधेरे में अपनी मांद से बाहर निकलते हैं और पौ फटने के पूर्व ही लकड़बग्घे, बिज्जू की भांति अपने-अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं।’
सामीप्यवर्जितों तथा दृष्टिवर्जितों की क्या कठिनाइयां होंगी? वे अपना जीवन कैसे काटते होंगे? यदि उनका दर्शन या उनका सामीप्य भी सहन नहीं किया जाता तो वे क्या रोजगार कभी पा सकते हैं? भीख मांगने और कुत्ते का मांस खाने के अलावा वे कर भी क्या सकते हैं? निश्चय ही कोई भी सभ्यता इससे अधिक क्रूर नहीं हो सकती। वास्तव में यह महान दया है कि सामीप्यवर्जितों तथा दृष्टिवर्जितों की संख्या बहुत कम है। पर क्या ये पांच करोड़ अस्पृश्य किसी भी सभ्यता के अधिकारी नहीं हैं?
अस्पृश्य लोग अपनी दुर्दशा से बच नहीं सकते, क्योंकि वे स्पृश्य की भांति घूम-फिर नहीं सकते। निश्चय ही जिस गांव में वे रहते हैं, वहां के लोग उन्हें जानते-पहचानते हैं और जब तक वे वहां रहते हैं, वे जाली रूप धारण नहीं कर सकते हैं। यदि वे गांव छोड़कर शहर में आ जाते हैं तो हो सकता है कि वे स्पृश्य की भांति वहां घूम-फिर सकें। लेकिन वे जानते हैं कि यदि उनके बारे में पता चल गया तो उनकी कैसी दुगर्ति होगी।
समाचारपत्रों में छपी निम्न घटना से कुछ अनुमान लग जाएगा कि जाली रूप धारण करने में कितना जोखिम होता हैः
रूढि़वादिता का पागलपन ख्1,
‘अस्पृश्यों’ के प्रति कथित बर्बर व्यवहारः महार होने का अपराध
अहमदाबाद से श्री केशवजी रनछोड़जी वघेल ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा
के अध्यक्ष डा. भीमराव अम्बेडकर को सूचना दी हैः
बापूराव लक्ष्माण और उनके भाई कौराओ पिछले छह सालों से अहमदाबाद
में रह रहे हैं। वे मराठा जाति के दक्कन से आए कुछ लोगों के साथ उठते-बैठते
थे। दामू और लक्ष्मण नामक कौराओं के दो बेटे मराठों की भजन मंडलियों
में हिस्सा लिया करते थे। लेकिन हाल में मराठों को पता चला कि दामू और
लक्ष्मण नामक दोनों भाई महार जाति के हैं और इस बारे में निश्चय करने
के लिए सूरत और अहमदाबाद के बीच चलने वाली पार्सल ट्रेन में काम
- बोंबे क्रानिकल, 25 फरवरी, 1938