13. हिंदुओं से अलगाव - Page 340

हिंदुओं से अलगाव

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आधार पर हिंदू धर्म की निरख-परख न हो सके। यह कैसी असाधारण बात है कि धर्म-परिवर्तन संबंधी विवाद में अस्पृश्यों को चुनौती देते समय एक भी हिंदू, हिंदू धर्म के दोषों को दर्शाने का साहस नहीं कर सकता है। हिंदू नाममात्र के लिए उस दृष्टिकाण की ओट ले रहा है, जिसे तुलनात्मक धर्म-विज्ञान ने जन्म दिया है। तुलनात्मक धर्म-विज्ञान ने सभी अपौरुषेय (श्रुति, इल्हाम वाले) धर्मों के इन बड़े-बड़े दावों को चकनाचूर कर दिया है कि केवल वे ही सच्चे हैं और अन्य सभी झूठे हैं, जो श्रुति आदि पर आधारित नहीं हैं। झूठे और सच्चे धर्म की परख करने के लिए अपौरुषेयता की कसौटी अति मनमानी और मन-गढ़ंत है। यह एक ऐसी महान सेवा है, जो धर्म के हित में तुलनात्मक धर्म-विज्ञान ने की है। लेकिन उस विज्ञान के विपक्ष में यह कहना ही पड़ेगा कि उसने इस सामान्य धारणा को जन्म दिया है कि सभी धर्म अच्छे हैं और उनके बीच विभेद करने में कोई अर्थ एवं प्रयोजन नहीं है।

एकमात्र पहली आपत्ति ही गंभीरता से विचार करने योग्य है। आपत्ति इस धारणा को लेकर चलती है कि धर्म नर और नारायण के बीच का विशुद्ध व्यक्तिगत मामला है। यह अलौकिक है। इसका सामाजिक पक्ष से कोई वास्ता नहीं। निश्चय ही तर्क जानदार है। लेकिन उसकी जड़ें एकदम खोखली हैं। जो भी हो, यह धर्म का एकांगी दृष्टिकोण है और वह भी धर्म के उन पक्षों पर आधारित है, जो नितांत ऐतिहासिक हैं, बुनियादी नहीं।

धर्म के कर्म तथा प्रयोजन को समझने के लिए जरूरी है कि धर्म को ईश्वर मीमांसा से अलग किया जाए। धर्म के प्रमुख अंग हैं µ रीति-रिवाज, प्रथाएं, अनुष्ठान और कर्मकांड। ईश्वर मीमांसा गौण पक्ष है। उसका उद्देश्य तो केवल उन्हें राष्ट्रव्यापी बनाना है। प्रो. राबर्टसन स्मिथ के अनुसार ख्1, ः

वास्तव में कहा जाए तो कर्मकांड और प्रचलित रिवाज ही प्राचीन धर्मों

के सार तत्व थे। आदिकाल में धर्म व्यावहारिक प्रयोग वाली आस्था-पद्धति पर

आधारित नहीं था। वह निश्चित परंपरागत रिवाजों का समूह था और समाज का

हर सदस्य साहस के साथ उसका पालन करता था। मानव, मानव नहीं रहेंगे,

यदि वे कार्य के लिए औचित्य के बिना कतिपय कार्यों को करने के लिए राजी

हो जाएं, पर प्राचीन धर्म में औचित्य को पहले सिद्धांत के रूप में अपना कर

बाद में उसे व्यवहार में नहीं लाया गया, अपितु उसके विपरीत व्यवहार के बाद

सिद्धांत पक्ष आया।

उतनी ही जरूरी यह बात है कि धर्म को अलौकिक न माना जाए। तथ्य यह है कि धर्म का प्रमुख पक्ष सामाजिक है। उसकी अनदेखी करना धर्म के साथ खिलवाड़

  1. दि रिलीजन ऑफ दि सेमाइट्स