13. हिंदुओं से अलगाव - Page 341

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करना है। बर्बर समाज का जीवन और जीवन के संरक्षण से गहरा सरोकार था। जीवित रहने की ये प्रक्रियाएं ही बर्बर समाज के धर्म का सार और स्रोत बनीं। जीवन और जीवन के संरक्षण से बर्बर समाज का इतना गहरा सरोकार था कि उसने उन्हें अपने धर्म का आधार ही बना डाला। बर्बर समाज के धर्म में जीवन और उसे संरक्षित रखने की प्रक्रिया इतनी महत्वपूर्ण थी कि उन्हें प्रभावित करने वाली हर वस्तु उनके धर्म का अंग बन गई। बर्बर समाज का सरोकार न केवल जन्म, पूर्ण-पुरुषत्व की प्राप्ति, तरुणाई, विवाह, बीमारी, मौत और युद्ध से था, अपितु आहार से भी था।

पशुपालकों के लिए पशुधन पवित्र है। खेतीबाड़ी करने वाले बुवई और कटाई के समय ऐसे उत्सव मनाते हैं, जिनका कुछ-न-कुछ सरोकार फलों की बढ़वार और रक्षा से होता है। इसी प्रकार सूखे, महामारी और उन जैसी प्रकृति की अन्य विचित्र अनियमित घटनाओं पर भी अनुष्ठान किए जाते हैं। जैसा कि प्रो. क्रौले ने कहा है, बर्बर समाज के धर्म का आदि और अंत जीवन के पोषण और पवित्रीकरण से होता है।

अतः बर्बर समाज का धर्म जीवन और जीवन के संरक्षण में निहित होता है। जो बात बर्बर समाज के धर्म के बारे में सच है, वही सर्वत्र सब धर्मों के बारे में सच है, क्योंकि वही धर्म का सार है। यह सच है कि परिष्कृत ब्रह्म-विज्ञान की चकाचौंध वाले आधुनिक समाज में धर्म का यह सार दृष्टि से ओझल हो गया है और विस्मृति के गर्त में भी चला गया है। लेकिन यह निर्विवाद तथ्य है कि आधुनिक समाज में भी जीवन और जीवन का संरक्षण धर्म का सार है। इसका समुचित दिग्दर्शन प्रो. क्रौले ने किया है। आधुनिक समाज में मानव के धार्मिक जीवन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा हैः

मानव के धर्म का संबंध उसके व्यावसायिक अथवा सामाजिक जीवन, उसके

वैज्ञानिक अथवा कलात्मक कर्म के क्षणों से नहीं रहता। वस्तुतः उसके खास

तकाजों को सप्ताह में एक दिन पूरा किया जाता है। उस दिन सामानय सांसारिक

सरोकारी से हाथ खींच लिया जाता है। वस्तुतः उसका जीवन दो भागों में विभक्त

है, लेकिन जो अर्धांश धर्म से जुड़ा है, वह तात्विक है। मोटे तौर पर कहा जाए

तो जीवन और मृत्यु के मूलभूत प्रश्नों पर गंभीर चिंतन उसके विश्राम दिवस की

सार वस्तु है। इसमें जोड़ दीजिए दैनिक प्रार्थना को, भोजन के समय प्रभु के प्रति

धन्यवाद को और इस अवचेतन धारणा को कि जन्म और मृत्यु का, वंशवृद्धि

और विवाह का विधिवत् संपादन धर्म ही करता है और संभव है कि व्यवसाय

और खुशी के अवसर पर भी अनुष्ठान हो, लेकिन लाक्षणिक रूप से या धार्मिक

भावना के उद्रेक के वशीभूत होकर।