13. हिंदुओं से अलगाव - Page 342

हिंदुओं से अलगाव

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धर्म की उत्पत्ति और इसके इतिहास के छात्रों ने जब बर्बर समाज का अपना अध्ययन शुरू किया तो वे बर्बर समाज से जुड़े जादू-टोनों, वर्जनाओं और पूजा-प्रतीकों, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों में इतना खो गए कि उन्होंने न केवल धर्म के मूल तत्व के रूप में बर्बर समाज की सामाजिक प्रक्रियाओं की ही अनेदेखी की, बल्कि वे जादू-टोने और अन्य अलौकिक प्रक्रियाओं की समुचित कार्य-प्रणाली को भी समझ न पाए। यह एक भारी भूल थी और वह धर्म से सरोकार रखने वाले सभी लोगों के लिए बड़ी मंहगी भूल सिद्ध हुई, क्योंकि उसी के कारण धर्म के संबंध में वह भारी गलतफहमी पैदा हुई है, जो आज अधिकांश लोगों के दिलों में बैठी हुई है। इससे बड़ी भूल और हो ही नहीं सकती कि धर्म के बारे में कहा जाए कि वह जादू-टोने से उपजा है और उसका आदि और अंत भी जाद-टोने से उपजा है और उसका आदि और अंत भी जादू-टोना करना है। यह सच है कि बर्बर समाज जादू-टोना करता है, वर्जना में विश्वास रखता है और गण-चिर्िं की पूजा करता है। लेकिन यह सोच लेना गलत है कि ये ही धर्म है अथवा धर्म इनसे ही उपजा है। ऐसे दृष्टिकोण का अर्थ तो यह होगा कि जो गौण है, प्रासंगिक है_ उसे धरती से उठाकर प्रमुखता के सिंहासन पर बिठा दिया जाए। बर्बर समाज के धर्म में प्रमुखता मानव-अस्तित्व के जीवन, मृत्यु, जन्म विवाह आदि जैसे मूल तथ्यों की है। जादू-टोना, वर्जना और गण-चिर्िं साध्य नहीं हैं। वे तो केवल साधन हैं। साध्य तो है, जीवन और जीवन का संरक्षण। जादू-टोना, वर्जना आदि का सहारा बर्बर समाज अपने स्वार्थ के लिए नहीं करता, बल्कि उसका उद्देश्य होता है कि जीवन की रक्षा हो और ऐसा अनुष्ठान हो कि बुरा प्रभाव जीवन को हानि न पहुंचा सके। फसल की कटाई और अकाल जैसे अवसरों के साथ धार्मिक अनुष्ठानों को क्यों जोड़ा जाए? जादू-टोना, वर्जना और गण-चिर्िं बर्बर समाज की दृष्टि में इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं? उसका एक ही जवाब है कि उन सबका सरोकार जीवन की रक्षा से है। मुख्य प्रयोजन है, जीवन और जीवन की रक्षा। बर्बर समाज के धर्म का मूलाधार और मर्म है, जीवन और जीवन की रक्षा। आज जादू-टोने का स्थान ईश्वर ने ले लिया हे, इससे यह तथ्य नहीं बदल जाता कि धर्म में ईश्वर का स्थान केवल जीवन-रक्षण के साधन के रूप में है और धर्म का साध्य है, सामाजिक जीवन का परिरक्षण और पवित्रीकरण।

एक बात की ओर विशेष ध्यान दिलाना जरूरी है। पूर्वोक्त चर्चा भी उसका पूर्ण समर्थन करती है। वह यह है कि धर्म को व्यक्तिगत, निजी और जाति का मामला समझना भूल है। वस्तुतः जैसा कि आगे पता चलेगा, धर्म जब व्यक्तिगत, निजी और जाति का मामला बना रहता है तो वह यदि खतरे का नहीं, तो प्रत्यक्ष शरारत का सबब तो बन ही जाता है। उतनी ही गलत दृष्टि यह कि धर्म व्यक्ति के स्वभाव में