13. हिंदुओं से अलगाव - Page 343

328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निहित विशेष जन्मजात धार्मिक भावना को पल्लवित करता है। सही दृष्टि यह है कि भाषा की भांति धर्म भी समाज के लिए है और उसका कारण यह है कि दोनों सामाजिक जीवन के लिए अति आवश्यक हैं और व्यक्ति को उन्हें अपनाना पड़ता है, क्योंकि उसके बिना वह सामाजिक जीवन में भाग नहीं ले सकता।

यदि धर्म इस अर्थ में समाज के लिए है कि उसका खास सरोकार समाज से है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि धर्म का प्रयोजन और कर्म क्या है?

मेरी जानकारी में धर्म के प्रयोजन के बारे में श्रेष्ठ कथन प्रो. चार्ल्स एल्लवुड ख्1, का है। वह कहते हैंः

धर्म समूचे संसार में मानव-व्यक्तिगत और मानव-समाज के मूल मूल्यों का

समूचे संसार में प्रक्षेपण करता है। अनिवार्यतः उसका जन्म ज्यों ही हो जाता है,

त्यों ही वह अपने संसार का मूल्यांकन करने का प्रयास करने लगता है, भले ही

उसे वह संसार कितना ही छोटा और घटिया क्यों न लगे। मानवीय, सामाजिक और

मानसिक जीवन की समूची विशिष्टताओं की भांति निश्चय ही उसका आधार भी

मानव की उच्च बौद्धिक शक्तियां हैं। मानव ही एकमात्र धार्मिक पशु है, क्योंकि

गूढ़ चिंतन एवं मनन की अपनी शक्तियों के कारण केवल वही पूर्णतः आत्म-चेतन

है। अतः केवल वही संसार में अपने मूल्यों का प्रक्षेपण कर सकता है और वही

प्रक्षेपण की जरूरत को अनुभव करता है। दूसरे शब्दों में, मानव को प्रदत्त बौद्धिक

शक्तियों के सहारे उसकी बुद्धि तुरंत अपने मूल्यों तथा विचारों को सर्वव्यापी बनाने

का प्रयास करती है। जिस प्रकार बुद्धिसंगतता की प्रक्रियाएं मानव को सर्वव्यापी

विचारों का जगत प्रदान करती हैं, ठीक उसी प्रकार धार्मिक प्रक्रियाएं मानव को

सर्वव्यापी मूल्यों का जगत प्रदान करती हैं। वास्तव में धार्मिक प्रक्रियाएं भी बुद्धिसंगतता

की वे प्रक्रियाएं ही हैं, जो मानव के आवेगों और भावों को प्रभावित करती हैं, न

कि उसकी नसीहतों को। जो काम तर्क विचारों के लिए करता है, वही काम धर्म

भावनाओं के लिए करता है। वह उन्हें सर्वव्यापी बनाता है और ऐसा करते समय

वह उनका सुर समूचे यथार्थ के सुर से मिला देता है।

धर्म सामाजिक मूल्यों पर बल देता है, उन्हें सर्वव्यापी बनाता है और उन्हें व्यक्ति के मन में बिठाता है। व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने कामों में उनका ध्यान रखे, ताकि वह समाज के अनुमोदित सदस्य के रूप में कार्य कर सके। लेकिन धर्म का प्रयोजन इससे भी बढ़कर है। वह उन्हें अध्यात्मक का जामा पहनाता है। जैसा कि प्रो. एल्लवुड ने कहा है ख्2, ः

  1. दि रिलीजियस रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 39-40

  2. वही, पृ. 45-46