13. हिंदुओं से अलगाव - Page 344

हिंदुओं से अलगाव

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अब धर्म से जुड़े इन मानसिक तथा सामाजिक मूल्यों को लोग ‘आध्यात्मिक’ कहते हैं। यह रेखांकित करने वाली बात है। जैसे कि हम कह सकते हैं, आध्यात्मिक मूल्य वे मूल्य हैं, जो खास तौर पर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन से जुड़े हैं। जैसा कि हमने देखा है, वह इन मूल्यों का प्रक्षेपण सर्वव्यापी यथार्थता में करता है। वह मानव को संसार की सामाजिक तथा नैतिक संकल्पना प्रदान करता है। वह मानव को निरुद्देश्य, प्रयोजनहीन शक्तियों के खिलवाड़ के रंगमंच के रूप में कोरी यांत्रिक संकल्पना प्रदान नहीं करता। भले ही धर्म मूलतः जड़ात्मवादी दर्शन नहीं है, जैसा कि अक्सर कहा गया है, फिर भी वह सभी बातों में मन, आत्मा और जीवन का प्रेक्षपण करता है। अति आदिम धर्म ने भी ऐसा किया है। ‘आदिम ऊर्जावाद’ में मन अथवा आत्मा जैसी संकल्पनाओं में अलौकिक या इंद्रियातीत की भावना थी। उनका व्यक्तियों से गहरा सरोकार था और उनका उद्गम ही ऐसे व्यक्तित्व अथवा तत्वों से होता था, जिन्हें अनिवार्यतः व्यक्तिगत ढंग से निरखा-परखा जाता था। अतः धर्म आध्यात्मिक मूल्यां की यथार्थता के प्रति आस्था है और जैसा कि हमनें कहा है, वह उनका प्रक्षेपण समूचे संसार में करता है। सभी धर्म, यहां तक कि तथाकथित अनीश्वरवादी धर्म भी, आध्यात्मिकता पर बल देते हैं, उसकी सत्ता में विश्वास करते हैं और उसकी अंतिम विजय की कामना करते हैं।

समाज में धर्म का कर्म भी उतना ही स्पष्ट है। प्रो. एल्लवुड ख्1, के अनुसारः

धर्म सामाजिक नियंत्रण की एजेंसी के रूप में कार्य करता है, यानी समूह व्यक्ति के जीवन का नियंत्रण समूह के बृहत्तर जीवन की भलाई के लिए करता है, जैसा कि हमने देखा है, एकदम-शुरू-शुरू में व्यक्तिगत भावनाओं अथवा मूल्यों को व्यक्त करने वाली जिन आस्थाओं और प्रथाओं को समूह मान्यता प्रदान नहीं करता था, उन पर ‘काले जादू’ अथवा हानिकर अंधविश्वास का ठप्पा लगा दिया जाता था। यदि ऐसा न किया जाता, तो जाहिर है कि समूह के जीवन की एकात्मता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता था। इस प्रकार धर्म का अनिवार्य सामाजिक स्वरूप उजागर हो जाता है। हम ऐसे धर्म को नहीं अपना सकते, जो नितांत व्यक्तिगत अथवा निजी हो और साथ-ही-साथ जो सामाजिक पक्ष वाला न हो, क्योंकि हम सामाजिक प्राणी हैं और बहरहाल समूह का हित खास महत्व का है।

इसी मसले पर अन्यत्र विचार प्रकट करते हुए उन्होंने कहा है ख्2, ः

धर्म का कर्म भी वही है, जो कानून और सरकार का है। वह ऐसा साधन

  1. दि रिलीजियस रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 42-43

  2. सोसाइटी इन इट्स साइकोलाजिकल आस्पेक्ट्स (1913), पृ. 365-57