330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है, जिसके द्वारा समाज-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए समाज व्यक्ति के
आचरण पर अंकुश रखता है। हो सकता है कि व्यक्ति पर सामाजिक नियंत्रण के
लिए जान-बूझकर उसका उपयोग न किया जाए। फिर भी तथ्य यह है कि धर्म
सामाजिक नियंत्रण का साधन है। धर्म के मुकाबिले, सरकार और कानून सामाजिक
नियंत्रण के अपेक्षतः भरपूर साधन नहीं है। कानून और व्यवस्था का नियंत्रण इतना
गहरा प्रभाव नहीं डालता कि समाज-व्यवस्था को स्थिरता प्रदान की जा सके।
दूसरी ओर, धार्मिक मान्यता अपनी अलौकितता के कारण सामाजिक नियंत्रण का
सर्वाधिकार कारगर साधन सिद्ध हुई है। कानून और सरकार न तो उतने कारगर
सिद्ध हुए हैं और न ही हो सकते हैं। निश्चय ही धर्म के सहारे के बिना कानून
और सरकार अति अधूरे साधन रह जाते हैं। धर्म सर्वाधिक सशक्त सामाजिक
गुरुत्वाकर्षण है और उसके बिना समाज-व्यवस्था को उसके परिक्रमा-पथ पर
रखना संभव नहीं होगा।
पूर्वोक्त चर्चा भले ही यह दर्शाने के लिए की गई है कि धर्म सामाजिक यथार्थ है, धर्म का विशिष्ट सामाजिक प्रयोजन है और है निश्चित सामाजिक कृत्य, फिर भी उसका उद्देश्य यह सिद्ध करता है कि यह उचित ही है कि यदि किसी व्यक्ति से किसी धर्म को स्वीकार करने की अपेक्षा की जाए, तो उसे यह प्रश्न करने का अधिकार होना चाहिए कि कहां तक धर्म ने धर्म से जुड़े प्रयोजनों को पूरा किया है। इसी कारण इस बात का औचित्य है कि लार्ड बेल्फोर ने पहले प्रत्यक्षवादियों से कुछ बड़े ही सीधे प्रश्न किए और उसके बाद ही वह स्वीकार कर सके कि प्रत्यक्षवाद ईसाई धर्म से श्रेष्ठतर है। उन्होंने अति कटु भाषा में प्रश्न किएः
उस अधिक त्रस्त, दीन-हीन जनसाधारण के लिए (प्रत्यक्षवाद) के पास क्या
सांत्वना है, जो अपनी दैनिक जरूरतों और छोटी-छोटी चिंताओं के सतत् संघर्ष
में डबू ही नहीं, अपितु आकंठ डूबे हैं, जिनके पास न तो समय है और न ही
इच्छा है कि वे ‘मानवीयता’ के महान नाटक के लिए अपेक्षित अपने सही रोल
पर विचार कर सकें और जो हो सकता है कि हर हाल में उसके हित अथवा
उसके महत्व को खोजने में परेशान हो जाएं? क्या वह उन्हें आश्वासन दे सकता
है कि कोई भी ऐसा निरर्थक मानव-प्राणी नहीं है, जिसका सनातन मूल्य स्वर्ग
अथवा इन निरीह प्राणियों की सृष्टि करने वाले ‘उसकी’ दृष्टि में नहीं हैं और
माटी के उसके पुतले के माटी में मिल जाने के बाद भी अनंत काल के लिए
उसके कर्म की सार्थकता बनी रहेगी? क्या वह शोक से संतप्त प्राणियों को सांत्वना
को अपने निर्बलों को बल प्रदान कर सकता है? क्या वह पापियों को क्षमा और
थकान और भारी भार से ग्रस्त प्राणियों को विश्राम प्रदान कर सकता है?