13. हिंदुओं से अलगाव - Page 346

हिंदुओं से अलगाव

331

लार्ड बेल्फोर ने प्रत्यक्षवादियों से जो प्रश्न किए थे, वे ही प्रश्न अस्पृश्य लोग हिंदू धर्म के पक्षधरों से कर सकते हैं। अस्पृश्य तो और भी अनेक प्रश्न कर सकते हैं। वे पूछ सकते हैंः क्या हिंदू धर्म उन्हें मानव-प्राणी के रूप में स्वीकार करता है? क्या वह उनके लिए समानता का समर्थन करता है? क्या वह उन्हें आजादी का लाभ देना चाहता है? कम-से-कम क्या वह उनके तथा हिंदुओं के बीच भाई-चारे की गांठ को मजबूत करने में मदद देता है? क्या वह हिंदुओं को सिखाता है कि अस्पृश्य उन्हीं के सजातीय हैं? क्या वह हिंदुओं से कहता है कि यह पाप है कि अस्पृश्यों से मानव तो क्या पशु से भी बदतर व्यवहार किया जाए? क्या वह हिंदुओं से कहता है कि वे अस्पृश्यों के साथ न्याय करें? क्या वह हिंदुओं को उपदेश देता है कि वे अस्पृश्यों के साथ न्यायोचित और मानवीय व्यवहार करें? क्या वह हिंदुओं के मानस में अस्पृश्यों के प्रति मैत्रिभाव रखने का संस्कार डालता है? क्या वह हिंदुओं को सिखाता है कि वे अस्पृश्यों से प्रेम करें, उनका आदर करें और उनका कोई अहित न करें? संक्षेप में, क्या हिंदू धर्म बिना किसी भेदभाव के जीवन के मूल्य को सर्वव्यापी बनाता है?

कोई भी हिंदू इनमें से किसी भी सवाल का जवाब ‘हां’ मे देने का साहस नहीं कर सकता। इसके विपरीत हिंदुओं ने अस्पृश्यों के प्रति जो अन्याय किए हैं, वे ऐसे कर्म हैं जिन्हें हिंदू धर्म मान्यता प्रदान करता है। वे हिंदू धर्म के नाम पर किए जाते हैं और उन्हें हिंदू धर्म के नाम पर उचित ठहराया जाता है। अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं की अराजकता को जो भावना और परंपरा वैध बनाती है, उसे आधार और समर्थन हिंदू धर्म के उपदेश प्रदान करते हैं। किस प्रकार हिंदू अस्पृश्यों से कह सकते हैं कि वे हिंदू धर्म को स्वीकार करें और हिंदू धर्म में बने रहें? किस कारण अस्पृश्य हिंदू धर्म से चिपके रहें, जब कि वह उनकी अधोगति के लिए पूर्णतः उत्तरदायी है? किस प्रकार अस्पृश्य हिंदू धर्म में बने रह सकते हैं? अस्पृश्यता मानव की अधोगति का निम्नतम स्तर है। निर्धनता बुरी है, लेकिन उतनी बुरी नहीं, जितनी की अस्पृश्यता। निर्धन गर्व कर सकता है। अस्पृश्य गर्व नहीं कर सकता। निम्न होना बुरा है, लेकिन उतना बुरा नहीं जितना कि अस्पृश्य गर्व नहीं कर सकता। अपने स्तर से ऊंचा उठ सकता है। कष्ट भोगना बुरा है, पर उतना बुरा नहीं है जितना अस्पृश्य के रूप में कष्ट भोगना। निम्न वर्ग को किसी-न-किसी दिन राहत मिलेगी, पर अस्पृश्य उसकी आशा नहीं कर सकता। दब्बूपन बुरा है, पर उतना बुरा नहीं जितना की अस्पृश्य होना। दब्बू लोग यदि विरासत में भूमि प्राप्त नहीं कर सकते, वे कम-से-कम दबंग तो हो सकते हैं। अस्पृश्य तो उसकी भी आशा नहीं कर सकते।

हिंदू धर्म में अस्पृश्यों के लिए आशा की कोई किरण नहीं है। लेकिन यही वह एकमात्र कारण नहीं है, जिसकी वजह से अस्पृश्य लोग हिंदू धर्म को छोड़ना चाहते हैं। एक और अनिवार्य कारण है, जो उन्हें हिंदू धर्म छोड़ने पर मजबूर करता