332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। अस्पृश्यता हिंदू धर्म का एक अंग है। प्रबुद्ध सुधारक होने का ढोंग करने वाले जो हिंदू कहते हैं कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का अंग नहीं है, उन्हें भी अस्पृश्यता का पालन करना पड़ता है। हिंदू धर्म में विश्वास करने से हिंदू को कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका यह बोध कि करोड़ों अस्पृश्य उससे नीचे हैं, श्रेष्ठता की उसकी भावना को हवा देता है। लेकिन जब कोई अस्पृश्य कहता है कि वह हिंदू धर्म में विश्वास करता है, तो उसका क्या अर्थ होता है? उसका अर्थ होता है कि वह स्वीकार करता है कि वह अस्पृश्य है और इसलिए अस्पृश्य है कि वह दैवी विधान है। हो सकता है कि कोई अस्पृश्य किसी हिंदू का गला न काटे। लेकिन उससे यह स्वीकार करने की आशा नहीं की जा सकती कि वह अस्पृश्य है और वह उचित ही है। है कोई ऐसा मृत आत्मा वाला अस्पृश्य जो ऐसी स्वीकृति दे और फिर भी हिंद धर्म से चिपका रहे। हिंदू धर्म अस्पृश्यों का आत्म-सम्मान के प्रतिकूल है। यह एक सबसे सशक्त आधार है और वह इस बात को उचित ठहराता है कि अस्पृश्य किसी अन्य उदार और उदात्त धर्म को ग्रहण कर लें।
धर्म-परिवर्तन के विरोधियों ने तो इस बात की कसम खा ली है कि वे धर्म-परितर्वन संबंधी अकाट्य तर्क से भी संतुष्ट नहीं होंगे। वे और प्रश्न करने का आग्रह करेंगे। एक और प्रश्न है, जिसे करने के लिए वे सदैव उत्सुक रहते हैं। उसका प्रमुख कारण यह है कि वे सोचते हैं कि वह बहुत टेढ़ा सवाल है और उसका जवाब नहीं दिया जा सकता। वह यह है कि धर्म-परितर्वन से अस्पृश्यों को कौन-सा दुनियावी लाभ मिल जाएगा? यह प्रश्न तनिक भी टेढ़ा प्रश्न नहीं है। जवाब सीधा-सा है। अस्पृश्य नहीं चाहते कि धर्म-परितर्वन को आर्थिक लाभ का अवसर बनाया जाए। यह सच है कि धर्म-परिवर्तन से अस्पृश्यों को कोई धन-संपत्ति नहीं मिल जाएगी। लेकिन यह कोई हानि नहीं है, क्योंकि हिंदू बने रहने पर भी निपट निर्धन ही बन रहेंगे। राजनीतिक दृष्टि से अस्पृश्य वे राजनीतिक अधिकार गंवा देंगे, जो उन्हें दिए जाते हैं। लेकिन वस्तुतः यह भी कोई हानि नहीं है। क्योंकि वे उन राजनीतिक अधिकारों को पाने के हकदार होंगे, तो उस समुदाय के लिए आरक्षित होंगे, जिसमें वे धर्म-परितर्वन द्वारा शामिल होंगे। राजनीतिक दृष्टि से न लाभ है और न हानि। सामाजिक दृष्टि से अस्पृश्यों को पूर्ण तथा भारी लाभ होगा, क्योंकि धर्म-परितर्वन द्वारा वे ऐसे समुदाय के सदस्य बन जाएंगे, जिसके धर्म ने जीवन के मूल्यों को सर्वव्यापी रूप और समानता प्रदान की है। हिंदू धर्म की परिधि में रहते हुए तो वे ऐसे वरदान की कल्पना तक नहीं कर सकते।
जवाब पूर्ण है। लेकिन संक्षिप्त होने के कारण हो सकता है कि धर्म-परितर्वन के विरोधियों को वह संतुष्ट न कर सके। अस्पृश्यों को तीन चीजों की दरकार है। पहली दरकार यह है कि उनके सामाजिक अलगाव का खात्मा हो। दूसरी दरकार यह है कि