हिंदुओं से अलगाव
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उनकी हीन भावना का अंत हो। क्या धर्म-परितर्वन उनकी जरूरतों को पूरा करेगा? धर्म-परितर्वन के विरोधियों का विचार है कि धर्म-परितर्वन के समर्थकों के केस में कोई जान नहीं है। इसी कारण वे प्रश्न-पर-प्रश्न उठाते रहते हैं। धर्म-परितर्वन के केस में सर्वाधिक जानदार केस से भी ज्यादा जान है। केवल हमारी इच्छा बनी रहती है कि प्रत्यक्ष को प्रमाणित करने के लिए लंबे-चौड़े तर्क पेश किए जाएं। लेकिन चूंकि यह जरूरी है कि सभी प्रकार के संदेहों को दूर कर दिया जाए, अतः मैं मामले पर और विचार करने के लिए तैयार हूं। मैं हर मुद्दे पर अलग से विचार करना चाहूंगा।
किस प्रकार वे अपने सामाजिक अलगाव का खात्मा कर सकते हैं? अस्पृश्यों के लिए अपने सामाजिक अलगाव का अंत करने का एकमात्र उपाय यही है कि वे जात-पांत की भावना से मुक्त किसी अन्य समुदाय से रक्त-संबंध जोड़कर उसमें घुलमिल जाएं। उत्तर सीधा-सा है। फिर भी अनेक लोग तत्काल उसकी वैधता को स्वीकार नहीं करेंगे। कारण यह है कि चंद लोग ही इस रक्त-संबंध की कीमत और
खासियत को समझ पाते हैं। फिर भी उसका मूल्य और महत्व अति विशाल है। रक्त-संबंध और उसमें निहित अर्थ को प्रो. राबर्टसन ने इस प्रकार समझाया है ख्1, ः
रक्त-संबंध से ऐसे व्यक्तियों का समूह बना, जिनके जीवन आपस में ऐसे
जुड़े हुए थे, जैसे कि शरीर के अंग आपस में जुड़े रहते हैं और उन्हें एक साझे
जीवन का अंग समझा जा सकता है। एक कुटुंब के सदस्य स्वयं को एक जीवंत
इकाई समझते थे। वे स्वयं को रक्त, मांस और मज्जा वाला एक जीवंत पिंड
समझते थे और सभी सदस्यों को कष्ट पहुंचाए बिना किसी एक सदस्य को हाथ
नहीं लगाया जा सकता था।
मसले पर दोनों के नजरिए से गौर किया जा सकता है, व्यक्ति के भी और समूह के भी। समूह के नजरिए से रक्त-संबंध इस भावना की अपेक्षा करता है कि हर संबंधी सर्वप्रथम और सर्वोपरि समूह का सदस्य है और वह मात्र व्यक्ति नहीं है। व्यक्ति के नजरिए से समूह से उसके रक्त-संबंध के लाभ उने लाभों से कम और भिन्न नहीं हैं, जो परिवार का सदस्य होने के नाते परिवार के किसी सदस्य को प्राप्त होते हैं। पारिवारिक जीवन मां-बाप के लाड़-प्यार से ओतप्रोत रहता है। प्रो. मैक्डोगल के शब्दों में ख्2,
(मां-बाप के लाड़-प्यार) की इस भावना और लालन-पालन की प्रेरणा
से उदारता, कृतज्ञता, प्रेम, दया, सच्चे परोपकार और हर प्रकार के परहितकारी
दि रिलीजन ऑफ दि सेमाइट्स, पृ. 273
इंट्रोडक्शन टू सोशल साइकोलाजी