13. हिंदुओं से अलगाव - Page 349

334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आचरण का जन्म होता है। उसी में उनकी प्रमुख तथा नितांत अनिवार्य जड़ समाई

रहती है। उसके बिना वे नहीं पनपेंगे।

समुदाय समाज से इस अर्थ में भिन्न है कि वह केवल एक बड़ा प्रिवार है। अतः उसमें वे सभी सद्गुण पाए जाते हैं, जो परिवार में पाए जाते हैं। प्रो. मैक्डोगल ने ऊपर उसका सुंदर निरूपण किया है।

समुदाय के भीतर उन लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता, जिन्हें रक्त-संबंधों से बंधे सगे-संबंधियों के रूप में माना जाता है। समुदाय मानता है कि उसका हर सदस्य और सभी की भांति सभी अधिकारों का समान रूप से हकदार है। जैसा कि प्रो. डेवी और प्रो. टफट्स ने कहा हैः

राज्य किसी अन्य देश के नागरिक को अनुमति दे सकता है कि वह भूमि

का स्वामी न बन सके, उसकी अदालतों में दावा दायर कर सकें और सामान्यतः

वह उसे कुछ संरक्षण भी प्रदान करेगा, लेकिन निश्चय ही प्रमुख अधिकारों पर

अंकुश लगेगा। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही मुख्य न्यायाधीश टैनी ने अमरीका के

वर्तमान कानूनी सिद्धांत के बारे में कहा था कि नीग्रो के ऐसे कोई अधिकार

नहीं हैं, जिन्हें स्वीकृति देने के लिए श्वेत मानव बाध्य हो। वहां भी जहां कानूनी

सिद्धांत जाति संबंधी अथवा अन्य भेदभावों को स्वीकार नहीं करता, प्रायः व्यवहार

में किसी परदेसी के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन ही होता है। आदिम कबीले

या परिवार-समूहों में यह सिद्धांत पूर्णतः लागू था। न्याय एक विशेषाधिकार है।

वह व्यक्ति को इसलिए प्राप्त होता है कि वह किसी समूह का सदस्य होता है।

अन्यथा वह उसे प्राप्त नहीं होता। कबीले या परिवार या ग्राम-समुदाय के सदस्य का

अधिकार होता है, अजनबी का कोई हक नहीं होता। मेहमान के नाते उसके साथ

विनम्र व्यवहार हो सकता है, लेकिन वह सिवाय अपने समूह के किसी अन्य से

‘न्याय’ की मांग नहीं कर सकता। समूह के भीतर अधिकारों की इस संकल्पना में

हमारे आधुनिक दीवानी (सिविल) कानून की प्रतिकृति है। एक कबीले और दूसरे

कबीले के बीच का मामला युद्ध अथवा वार्ता का मामला होता है, कानून का नहीं

और कबीला-रहित व्यक्ति तथ्यतः और वस्तुतः ‘बहिष्कृत’ व्यक्ति होता है।

रक्त-संबंध के कारण समुदाय किसी सदस्य के प्रति किए गए अन्याय का प्रतिशोध लेने का दायित्व ग्रहण करता है। तटस्थ दृष्टि से जो रक्तपात किसी सदस्य के प्रति किए गए अन्याय के प्रतिशोध के बर्बर तरीका दीख पड़ता है, वह आत्मपरक दृष्टि से अपने बंधु के प्रति किए गए अन्याय के लिए समुदाय के सदस्यों के सहानुभूतिपूर्ण रोष का प्रदर्शन है। सहानुभूतिपूर्ण रोष कोमल भावना और क्रोध का मिश्रण है। वह वैसा ही है, जैसा कि माता-पिता के वात्सल्य से उस समय उपजता है, जब उनके सामने बच्चे के प्रति अन्याय