हिंदुओं से अलगाव
337
रक्त-संबंध के लिए पूर्व शर्त हो गई। इस संबंध में जरूरी है कि प्रो. राबर्टसन ख्1, द्वारा बताए गए इस महत्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में रखा जाए कि समुदाय में सामाजिक निकाय केवल व्यक्तियों का समूह नहीं होता है, बल्कि देवी-देवताओं और व्यक्तियों का समूह होता है। अतः जो अजनबी किसी समुदाय में शामिल होकर रक्त-संबंध स्थापित करना चाहता है, वह ऐसा तभी कर सकता है, जब वह समुदाय के देवों या देवी-देवताओं को स्वीकार कर ले। यथा ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ की उक्तियों को लें। नाओमी रूथ से कहते हैंः ‘मेरी बहन अपने लोगों और अपने देवों के बीच वापस चली गई है।’ रूथ का जवाब है, ‘तेरे लोग मेरे लोग होंगे और तेरा प्रभु मेरा प्रभु होगा।’ इन सभी प्रमाणों से पता चलता है कि समुदाय में रक्त-संबंध की स्थापना साझे धर्म के प्रति उनकी निष्ठा के कारण होती है। साझे धर्म के बिना रक्त-संबंध स्थापित नहीं हो सकता।
जहां लोग इस ताक में हों कि धर्म-परिवर्तन संबंधी तर्क में दोष निकाले जाएं, वहां बेहतर होगा कि इस बात की कोई गुंजाइश ही न छोड़ी जाए कि छिद्रान्वेशी कोई संदेह या गलतफहमी पैदा कर सकें। अतः यह बताना ठीक ही होगा कि कैसे और किस प्रकार धर्म रक्त-संबंध की स्थापना कर सकता है। जवाब सीधा-साधा है। सामूहिक खान-पान के जरिए वह ऐसा करता है ख्2, । हिंदू अपनी जातिप्रथा का समर्थन करते हुए सहभोज के तर्क की खिल्ली उड़ाते हैं। वे कहते हैंः सहभोज में क्या धरा है? समाज-विज्ञान की दृष्टि से उत्तर है कि उसी में तो सब कुछ धरा है। रक्त-संबंध भाईचारे का सामाजिक प्रतिज्ञा-पत्र है। सभी प्रतिज्ञा-पत्रों की भांति इसे भी हस्ताक्षर करके, मुहरबंद करके समर्पित करना पड़ता है। उसके बाद ही वह बाध्यकारी हो सकता है। हस्ताक्षर करने, मुहरबंद करने और समर्पित करने का तरीका क्या हो, इसकी व्यवस्था धर्म करता है। वह तरीका है, प्रभु-भोज में भागीदारी का। प्रो. स्मिथ ख्3, के शब्दों मेंः
उस भाई-चारे का अंतिम स्वरूप क्या होता है, जो लोगों के सामूहिक
खान-पान के फलस्वरूप बनता है या घोषित किया जाता है? हमारे जटिल समाज
में सामाजिक भाई-चारा कई प्रकार और कई परतों वाला होता है। कतिपय प्रयोजनों
के लिए लोग कर्तव्य और सम्मान के बंधनों से एकजुट हो सकते हैं और अन्य
सभी प्रयोजनों के लिए वे अलग-थलग रहते हैं। प्राचीन-काल में भी, जैसे ‘ओल्ड
टेस्टामेंट’ में हम देखते हैं कि विभिन्न प्रकार की प्रतिज्ञाओं को पक्का करने के
लिए सामूहिक सहभोज के पवित्र संस्कार की व्यवस्था थी। लेकिन हर दशा में
प्रतिज्ञा निरंकुश और अलंघनीय है। नीति-शास्त्र की दृष्टि से उसे पूर्ण दायित्व
- दि रिलीजन ऑफ दि सेमाइट्स, व्याख्यान II, प्रो. स्मिथ ने यह विभेद किया है, जैसे वह प्राचीन समाज
और आधुनिक समाज के बीच का विभेद हो। इसका व्यापक महत्व है। वस्तुतः यह ऐसा विभेद है, जो
समुदाय और समाज के बीच अंतर करता है।
- इस विषय के बारे में देखिए स्मिथ की कृति, दि रिलीजन ऑफ दि सेमाइट्स पृ. 270-71
- वही, पृ. 271-72