338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वाला कर्तव्य कहा जा सकता है। अब अति आदिम समाज में केवल एक ही
प्रकार का भाईचारा है और वह निरंकुश और अलंघनीय है। आदिम मानव के
अनुसार, अन्य सभी मानवों की केवल दो श्रेणियां हैं। वे जिनके लिए उसका
जीवन पवित्र है और वे जिनके लिए वह पवित्र नहीं है। पहली श्रेणी के लोग
उसके बंधु-बांधव है। दूसरी श्रेणी के लोग पराए हैं और खतरनाक शत्रु हैं, और
उनके साथ तब तक किसी अलंघनीय संबंध स्थापित करने की बात सोचना भी
निरर्थक है, जब तक कि उन्हें पहले उस परिधि में नहीं लाया जाता, जिसमें हर
व्यक्ति का जीवन उसके सभी साथियों के लिए पवित्र है।
यदि अस्पृश्यों के लिए अपना अलगाव तथा उससे पैदा होने वाले उपद्रवों को समाप्त करने के वास्ते केवल नागरिकता पर्याप्त नहीं है, यदि उसका एकमात्र उपाय रक्त-संबंध की स्थापना है, तो उसका एक ही रास्ता है कि उस समुदाय के धर्म को अंगीकर कर लिया जाए, जिससे वे रक्त-संबंध स्थापित करना चाहते हैं।
अभी तक प्रस्तुत तर्क का उद्देश्य यह दर्शाना है कि किस प्रकार धर्म-परिवर्तन अस्पृश्यों के अलगाव की समस्या का समाधान कर सकता है। अभी दो अन्य प्रश्नों पर विचार करना है। एक तो यह कि क्या धर्म-परिवर्तन से उनकी हीन भावना दूर हो जाएगी? निश्चय ही इस बारे में कोई सिद्धांत नहीं बघार सकते। लेकिन हम इस प्रश्न का उत्तर ‘हां’ में तो दे ही सकते हैं। अस्पृश्यों की हीन भावना उनके अलगाव से, उनके प्रति भेदभाव से और उनके प्रति समाज की बेरुखी से उपजी है। इन्हीं ने उनके भीतर लाचारी की भावना भरी है। इन्हीं के कारण हीन भावना पैदा हुई। हीन भावना से उनका आत्म-बल क्षीण हो गया।
क्या धर्म अस्पृश्यों की इस मनोवृत्ति को बदल सकता है? मनोवैज्ञानिक का विचार है कि धर्म यह कर्म कर सकता है, यदि वह सही प्रकार का धर्म हो, यदि धर्म की दृष्टि में व्यक्ति पतित, निकम्मा और बहिष्कृत व्यक्ति न हो, बल्कि बांधव एवं मानव-प्राणी हो_ यदि धर्म उसे ऐसा वातावरण प्रदान करे जिसमें उसे लगे कि वहां ऐसी संभावनाएं हैं कि वह स्वयं को दूसरे हर मानव-प्राणी के बराबर समझ सके, तो कोई कारण नहीं कि अस्पृश्य ऐसे धर्म को अंगीकार करके अपने युगों पुराने उस निराशावाद को दूर न कर सकें, जिसके कारण उनमें हीन भावना भर गई है। जैसा कि प्रो. एल्लवुड ने कहा है ख्1, ः
मूल्यांकन धर्म की मूल प्रवृत्ति है। वह व्यक्ति के विचारों को नहीं, अपितु
उसकी इच्छा और उसके मनोभावों को सर्वव्यापी बनाता है। इस प्रकार वह अपने
- दि रिकंस्ट्रशन ऑफ रिलीजन, पृ. 40-41