हिंदुओं से अलगाव
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जगत के साथ अपनी इच्छा और मनोभावों को समरसता प्रदान करता है। अतः वह
निराशावाद और नैराश्य के इलाज का शुल्क है। चाहे सभ्य मानव हो या असभ्य, वह
जीवन के संग्राम में दोनों के मन में आशा का संचार करता है और आत्म-विश्वास
को जागृत करता है। जैसा कि हमने कहा है, वह ऐसा करता है, क्योंकि वह
ओजस्वी भावना को स्फूर्ति प्रदान करता है। मनोवैज्ञानिक कि वह आजेस्वी भावना
को इसलिए स्पूर्ति प्रदान करता है कि वह एक अनुकूलन प्रक्रिया है और उसमें
जीवन के सभी निम्नतर केंद्रों की मदद से उच्चतर केंद्रों को सुदृढ़ किया गया है।
दूसरे शब्दों में, मनोदैहिक शब्दवलि में मूल्यों को सर्वव्यापी बनाने का अर्थ है कि
निम्नतर स्नायु-केंद्र अपनी शक्तियां उच्चतर स्नायु-केंद्रों में उंडेल देते हैं। इस प्रकार
वे समन्वय करते हैं और अधिक-से-अधिक मात्रा में अत्यावश्यक जीवन-दक्षता
को भीतर की ओर प्रवाहित करते हैं। इस प्रकार जीवन के संकट का सामना करने
के लिए धर्म ऊर्जा के नए स्तरों को दोहन करता है और साथ-ही-साथ बाह्य और
आंतरिक के बीच और गहरा समन्वय करता है।
क्या धर्म-परिवर्तन अस्पृश्यों की सामान्य सामाजिक स्थिति में सुधार करेगा? यह समझ पाना कठिन है कि किस प्रकार इस प्रश्न के बारे में मतभेद हो सकता है।
शेक्सपियर ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है और प्रायः उसे उद्धृत किया जाता है कि नाम में क्या धरा है। पर उससे नाम की समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं होता। कहते हैं कि यदि गुलाब को गुलाब न कहा जाए तो भी वह उतनी ही मधुर सुगंध देगा, पर यह कथन तभी सच होगा यदि नामों का कोई प्रयोजन न हो और यदि लोग नामों पर निर्भर करने के बजाए हर मामले की निरख-परख करने का कष्ट उठाएं और अपनी निरख-परख के आधार पर उसके बारे में अपने विचार और दृष्टिकोण बनाएं। स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। नामों का अति महत्वपूर्ण प्रयोजन है। सामाजिक अर्थव्यवस्था में उनकी भारी भूमिका है। नाम प्रतीक हैं। हर नाम के साथ किसी वस्तुत के बारे में कतिपय विचार और भाव जुड़ हैं। वह ठप्पा है। लोग ठप्पे से जान जाते हैं कि वह क्या है। इससे उन्हें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उन्हें व्यक्तिगत रूप से हर मामले की निरख-परख नहीं करनी पड़ती। उन्हें स्वयं यह तय नहीं करना पड़ता कि वस्तु से सामान्यतः जुड़े विचार और भाव सही हैं या नहीं। समाज में लोगों का पाला इतनी सारी वस्तुओं से पड़ता है कि उनके हर मामले की निरख-परख करना असंभव ही होगा। वे नाम पर निर्भर करेंगे। यही कारण है कि सभी विज्ञापक बढि़या नाम खोजने के लिए आतुर रहते हैं। यदि नाम आकर्षक नहीं होगा तो लोग चीज नहीं खरीदेंगे।