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जातिप्रथा और धर्म-परिवर्तन

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जौली और लयाल के पक्ष में दीख पड़ती है, क्योंकि जब तक हम यह नहीं मानते कि हिंदू धर्म ने निश्चय ही कुछ-न-कुछ प्रचार व प्रसार का कार्य किया, तब तक इस बात का आकलन नहीं किया जा सकता कि किस प्रकार उसका प्रसार एक ऐसे विशाल महाद्वीप में हुआ, जिसमें अपनी-अपनी विशिष्ट संस्कृति वाली विभिन्न जातियां बसी हुई हैं। इसके अलावा कतिपय यज्ञों तथा यागों के के प्रचलन को तभी स्पष्ट किया जा सकता है, जब यह मान लिया जाए कि ब्रात्यों (पतितों, अनार्यों) की शुद्धि के लिए अनुष्ठान थे। अतः हम निरापद रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि प्राचीन-काल में हिंदू धर्म ने धर्म का प्रचार व प्रसार किया। लेकिन किसी कारणवश उसके ऐतिहासिक क्रम में काफी समय पूर्व यह कार्य बंद हो गया था।

मैं इस प्रश्न पर विचार करना चाहता हूं कि किस कारण हिंदू धर्म, धर्म-प्रचार करने वाला धर्म नहीं रहा। इसके अलग-अलग स्पष्टीकरण हो सकते हैं। मैं अपना निजी स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना चाहता हूं। अरस्तू ने कहा है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अपने कथन के समर्थन में अरस्तू के तर्कों का जो भी औचित्य रहा हो, पर इतना तो सच है कि यह तो संभव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति शुरू से ही इतना व्यक्तिवादी हो जाए कि वह स्वयं को अपने संगी-साथ्यिं से एकदम अलग-थलग कर ले। सामाजिक बंधन मजबूत बंधन है और वह आत्म-चेतना के विकास के साथ ही गहरा जुड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी और अपने हित की चिंता में दूसरों की तथा उनके हितों की मान्यता शामिल है और एक प्रकार के प्रयोजनों के लिए उसका प्रयास, चाहे उदार हो या स्वार्थपूर्ण, उस हद तक दूसरे का भी प्रयास है। सभी अवस्थाओं में व्यक्ति के जीवन, हितों और प्रयोजनों के लिए सामाजिक संबंध का मूल महत्व है। अपने जीवन की सभी परिस्थितियों में वह सामाजिक संबंधों की ओजस्विता को अनुभव करता है और समझता है। संक्षेप में, जैसे पानी के बिना मछली जिंदा नहीं रह सकती, वैसे ही वह समाज के बिना जिंदा नहीं रहा सकता।

इस तथ्य से यह निष्कर्ष निकलता है कि इससे पूर्व कि कोई समाज किसी का धर्म-परिवर्तन कर सके, उसे यह देखना ही होगा कि उसके गठन में ऐसी व्यवस्था हो कि परदेसियों को उसका सदस्य बनाया जा सके और वे उसके सामाजिक जीवन में भाग ले सकें। उसका उपयोग इस प्रकार का होना ही चाहिए कि उन व्यक्तियों के बीच कोई भेदभाव न हो, जो उसमें पैदा हुए हैं और जो उसमें बाहर से लाए गए हैं। उसका हर स्थिति में खुलेदिल से स्वागत होना ही चाहिए, ताकि वह उसके जीवन में प्रवेश कर सके और इस प्रकार उस समाज में घुलमिल और फल-फूल सके। यदि परदेशी के बारे में धर्म-परिवर्तन संबंधी ऐसा कोई प्रावधान नहीं होगा तो तुरंत यह प्रश्न उठ खड़ा होगा कि धर्म-परिवर्तन करने वाले को कहां स्थान दिया जाए। यदि