अस्पृश्यों का ईसाईकरण
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ईसाइयों द्वारा ईसाईयों के लिए किए गए प्रयासों की गणना करते हैं। हम उन मिशनरियों की अनेक पत्नियों की गणना भी नहीं करते, आंकड़ों की दृष्टि से जिनका प्रतिनिधित्व उनके पति करते हैं। डेनिश मिशनरी सोसाइटी के अध्यक्ष माननीय जे. वाहल ने ये निष्कर्ष उन्हें छोड़कर दिए हैं। हम मानते हैं कि उनका आकलन सबसे सही ढंग से किया गया है और जहां आकलन के बिना काम नहीं चला, वहां लगभग अति सतर्कता से आकलन किया गया है। तुर्की और मिस्र में केवल मुस्लिमों के बीच किए गए काम का आकलन किया गया है।
1890 1891
आय (अंग्रेजी धन) पौंड 2,412,938 पौंड 2,749,340
मिशनरी वर्ग 4,652 5,094
मिशनरी वर्ग 2,118 2,445
(अविवाहित महिलाएं)
देशी पादरी 3,424 3,730
अन्य देशी मददगार 36,405 40,438
ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले 9,66,856 1,168,560
हमने 1892 के निष्कर्षों का ब्योरेवार आकलन नहीं किया है, क्योंकि वे प्रकाशित होने ही वाले हैं। वर्ष 1893 का तो सवाल ही नहीं उठाता। लेकिन उसे विशेषज्ञ स्वयं ही कर सकते हैं। हम तो बस यही कहेंगे कि खासकर भारत में इन इन दो वर्षों में देशी ईसाइयों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। उसे ध्यान में रखते हुए अब उनकी संख्या 1,300,000 होनी चाहिए। उसके अनुसार सभी गैर-ईसाई देशों में देशी समुदाय की संख्या 5,200,000 होनी चाहिए।
डीन वाहल के आंकड़ों का आधार वे रिपोर्टें हैं, जो अमरीका के लिए 1649 की क्रौमवेल्स न्य इंग्लैंड कंपनी से लेकर 1891 तक की 304 मिशन सोसाइटियों और एजेंसियों से प्राप्त हुई हैं। अगले पृष्ठ पर परिष्कृत ईसाई जगत में प्राप्त विवरण का सारांश दिया गया है। सन् 1891 में ब्रिटिश साम्राज्य के 160 मिशन चर्चों तथा सोसाइटियों से 1,659,830 पौंड तथा अमरीका के 57 मिशन चर्चों आदि से 786,992 पौंड एकत्र किए गए। अंग्रेजी-भाषी दो बड़े देशों ने मिलकर गैर-ईसाई जगत के ईसाईकरण पर 24,46,822 पौंड खर्च किए। शेष 302,518 पौंड का अंशदान जर्मनी तथा स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स, डेन्मार्क, फ्रांस, नार्वे, स्वीडन तथा एशिया ने किया।