352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अब इस ध्येय के लिए प्रयुक्त संसाधनों का अनुमान प्रस्तुत करना संभव नहीं है, क्योंकि अब उनका प्रकाशन नहीं किया जाता। लेकिन इस बात की जानकारी के लिए हमारे पास पर्याप्त आंकड़े हैं कि इन 60 लाख लोगों के ईसाईकरण में कितना समय लगा।
इस बात का कोई लेखा-जोखा नहीं है कि किस प्रथम मिशनरी ने भारत में आकर ईसाई धर्म का बीज बोया। ऐसा विश्वास है कि भारत में ईसाई धर्म का उद्देश्य देवदूत से हुआ। कहा जाता है कि देवदूत टामस इसके संस्थापक थे। ईसाई धर्म का उद्गम देवदूत से हुआ, यह केवल एक दंतकथा है, भले ही मद्रास के निकट तथाकथित सेंट टामस का माउंट है, जिसे देवतदूत का कब्रिस्तान कहा जाता है। ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है, जिससे पता चल सके कि पहली सदी में भी भारत में ‘बाइबिल’ के संदेश का प्रचार हुआ था। कुछ ऐसा साक्ष्य मिलता है कि दूसरी सदी में ‘बाइबिल’ का संदेश दक्षिण भारत में समुद्र तट पर बसने वालों, श्रीलंका के सीपी निकालने वाले गोताखोरों तथा मलाबार और कोरोमंडल के तटवर्ती किसानों के कानों में पड़ा था। जब वापस लौटने पर मिस्री नाविको ने यह समाचार दिया तो वह अलेक्जांड्रिया के ईसाइयों में फैला। सबसे पहले अलेक्जांड्रिया ने भारत में एक ईसाई मिशनरी को भेजा। उसका नाम इतिहास में दर्ज है। उसका नाम पैन्टोनस है। वह यूनान के स्टोइक दार्शनिक थे। वे ईसाई बन गए थे। उन्हें अलेक्जांड्रिया के बिशप डेमेट्रियस ने दीक्षार्थी-विद्यालय के प्रधानाचार्य और एकमात्र धर्म-शिक्षक के रूप में नियुक्त किया था। इस विद्यालय की स्थापना गैर-ईसाइयों को ईसाई धर्म के तत्वों और सिद्धांतों की शिक्षा देने के लिए की गई थी। 180 और 190 ई. के वषों के बीच किसी समय भारत के ईसाइयों ने अलेक्जांड्रिया के बिशप से अपील की कि उनके पास किसी मिशनरी को भेजा जाए।
तद्नुसार, पैन्टोनस को भेजा गया। इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है कि भारत में वह कितने दिन रहे, देश के भीतर उन्होंने कहां तक यात्रा की और वस्तुतः उन्होंने क्या-क्या कार्य किया। बस केवल इतना पता चलता है कि वह लौटकर अलेक्जांड्रिया चले गए और 211 ई. तक उसके प्रधानाचार्य बने रहे।
तीसरी सदी के दौरान भारत में ‘बाइबिल’ के प्रचार-प्रसार के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। लेकिन यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जब सम्राट कान्स्टेन्टाइन जोहानेस के धर्म-परिवर्तन के बाद 325 ई. में निकाका की धर्म-परिषद् की बैठक हुई थी, जो एकत्रित धर्माधिकारियों में से एक ने स्वयं को ‘फारस तथा विशाल भारत का अधिधर्माध्यक्ष’ बताया था। इस तथ्य से पता चलता है कि उस समय भारत के समुद्र तट पर ईसाइयों का एक विशाल और महत्वपूर्ण चर्च स्थापित था। दूसरी ओर,